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क्या इंडिया गठबंधन को कमज़ोर करने में उसमें शामिल दलों का हाथ है

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Tauseef Qureshi

लखनऊ,(Shah Times) ।इंडिया गठबंधन को कमज़ोर करने के लिए मोदी की भाजपा हर उस हथकंडे को अपना रही जिससे इंडिया गठबंधन के कमज़ोर होने का संदेश जनता में चला जाए उसमें वह किसी हद तक कामयाब भी दिखाई दे रही है जैसे जयंत सिंह को उनके दादा को भारत रत्न देकर अपने साथ करना नीतीश कुमार को तोड़ने के लिए क्या षड्यंत्र किए यह भी हम सबने देखा है उसके लिए इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दल जो सियासी दल कम अपने निजी मफाद को साधने के चलते मोदी के हाथों में खेल रहे है जिसकी वजह से गठबंधन को सीटों के रुप फाइनल नहीं किया जा रहा है।

माना यह जा रहा है कि सपा कंपनी के सीइओ यूपी जैसे बड़े राज्य की सियासी गाड़ी के मुख्य ड्राइवर के रुप में बैठने के लायक नहीं है जयंत के जाने में सपा कंपनी की भूमिका संदिग्ध रही है इससे इंकार नहीं किया जा सकता हैं। मोदी की भाजपा जिस तरह सरकार चला रही है उसके लिए बहुत ही बहादुर निडर साहसी नेता उसके सामने टिक सकता हैं और क्षेत्रीय दलों में लालू प्रसाद यादव को छोड़कर कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो मोदी की सरकार का मुकाबला कर सकें जेल जाना बहुत आसान नहीं है हर नेता संघर्ष के रास्ते सियासत नहीं करना चाहता एसी के कमरों में बैठकर सियासत करना चाहते है और कर भी रहे है ।

जननायक राहुल गांधी को छोड़कर बाक़ी सभी नेता मोदी का सामना करने से डरते है क्योंकि आराम का मामला है। लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा में 80 सांसद भेजने वाले सूबा है उत्तर प्रदेश में अभी तक कांग्रेस और सपा गठबंधन पर फैसला नहीं हो सका है इसके लिए सपा के सीईओ को जिम्मेदार माना जा रहा है। एक बहुत बड़ा वोटबैंक है जो भाजपा को सूबे में रोकना चाहते है। सूबे की जनता चाहतीं हैं कि जल्द से जल्द सपा-कांग्रेस में गठबंधन की सीटों का एलान हो जाये लेकिन सपा कंपनी ने जिस नेता को यह सब बातचीत फाइनल करने के लिए अधिकृत किया हुआ है वह गठबंधन की टेबल पर ऐसी शर्तें रखता है जो गठबंधन के दल को स्वीकार्य नहीं हो सकती हैं इससे जाहिर होता है कि वह नेता मोदी की भाजपा से मिला हुआ है या सपा कंपनी का सीईओ मिला हुआ है। जल्द सीट फाइनल हो जाए जिससे प्रत्याशी क्षेत्र में उतरकर तैयारी कर सकें।


चर्चा है कि सपा के सीईओ अखिलेश यादव के मुख्य सिपहसालार भाजपा को लाभ पहुंचाने को अंदरखाने काम कर रहे हैं।पहले सपा के 16 लोकसभा प्रत्याशियों का एकतरफा एलान कर गठबंधन को झटका दिया गया। अब गठबंधन में सीटों का पेंच फंसाकर देरी की जा रही है।जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है। ऐसी शर्तें लगाई जा रही हैं जिनपर कांग्रेस का तैयार होना मुमकिन न हो सके। उदारहरण के लिए सपा के सिपहसालार कांग्रेस को सीट तो देना चाहते हैं लेकिन कांग्रेस के प्रत्याशी फला न हों इस शर्त के साथ।जैसे लखीमपुर खीरी की सीट इस शर्त पर देना चाहते हैं कि हाल ही में पार्टी में शामिल हुए पूर्व सांसद रवि वर्मा को कांग्रेस प्रत्याशी न बनाये।आखिर इन शर्तों का क्या मतलब है ?

गठबंधन में जिस पार्टी को जो सीट मिलती है उस पार्टी का निर्णय होता है कि वह उस सीट पर अपना प्रत्याशी किसे बनाये। रालोद को भी इन्ही शर्तों ने भागने का मौका दिया है यह हम सब जानते है,लेकिन यहां तो उल्टी गंगा वह रही है। कांग्रेस की सीटें और प्रत्याशी दोनों सपा सिपहसालार तय करना चाहते हैं। इसी वजह से अभी तक सपा-कांग्रेस गठबंधन की सीटों का फैसला नहीं हो पा रहा है।राजनीति के जानकारों का मानना है कि लखनऊ से भाजपा के राजनाथ सिंह को हमेशा की तरह वाकओवर देने को सपा ने बेहद कमजोर प्रत्याशी उतारा है जबकि लखनऊ में कांग्रेस बढिया चुनाव लडती है। लोगों को आशंका है कि और भी कई भाजपा नेताओं के सामने सपा कंपनी कमजोर उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहीं है। इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो समय बताएगा लेकिन लोगों का इशारा एक पूर्व एमएलसी की ओर है जो सपा प्रमुख को गुमराह कर भाजपा को फायदा पहुंचा रहे हैं।यह वह नेता है जिसके बूथ पर हमेशा सपा कंपनी हारती रही है और खुद एमएलसी का नामांकन भी फाइल नहीं कर पाए थे अपने कपड़े फटवा लिए थे इतने कद्दावर नेता है अखिलेश यादव के ये रत्न।अब उसका क्या किया जा सकता हैं जिसके रत्न ही ऐसे हो कि अपना नामांकन की दाखिल ना करा सकते हो।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी,दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जैसे नेता कहने को मोदी सरकार का विरोध करते हैं जबकि हकीकत में यह सब मोदी की भाजपा सत्ता में बनी रहे इस तरह का जाल बुनते रहते है।इनकी मजबूती का कारण भाजपा का सत्ता में बने रहना ही है वरना यह सब दल खत्म हो जाएगें।तो क्या इंडिया गठबंधन को कमज़ोर उसमें शामिल प्राइवेट कंपनियों की तर्ज़ पर दल ही कर रहे है और जनता यह समझ रही है या नहीं समझ पा रही है वैसे देखा जाए तो देश सियासी तौर पर दो भागों में बट गया है एक भाग सांप्रदायिकता को पसंद कर रहा और दूसरा सांप्रदायिकता के खिलाफ़ लड़ाई लडता दिखाई दे रहा है और जो सांप्रदायिकता की लडाई का नेतृत्व कर रहा उसके खिलाफ़ जाने वाले को जनता सबक भी सिखा सकती हैं।नफ़रत की सियासत करने वालों का दाएं बाएं से साथ देने वालों को मोहब्बत की सियासत के हामी समझ रहे हैं कि कौन नेता क्या कर रहा है और क्या करना चाहिए।

(लेखक शाह टाइम्स समाचार पत्र में समूह समाचार संपादक एवं मुख्य समन्वयक है)

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