योगी आदित्यनाथ का चेहरा और बोल ही काफी

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उत्तर प्रदेश में  इन दिनों सियासत बहु तेजी से चक्कर लगाने  लगी है। नफा नुकसान का आकलन कर नेताओं ने पाला बदलना भी शुरू  कर दिया है। भाजपा  से भी कुछ लोग इधर उधर गये हैं लेकिन योगी आदित्य नाथ का चेहरा सत्ता वापसी के लिए अब भी पर्याप्त माना जा रहा है। भाजपा छोड़कर जो लोग जा रहे हैं, उनको आशंका है कि इस बार उनको टिकट नहीं  मिलेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगामी विधानसभा चुनाव कहां से लड़ेंगे,  इस पर भी लोगों की निगाह टिकी  है। कुछ दिन पहले कहा गया था कि योगी मथुरा से चुनाव  लड़ सकते हैं, अब कहा जा रहा है कि सीएम मथुरा से चुनाव नहीं लड़ेंगे। 
सूत्रों के मुताबिक, 12 जनवरी को राजधानी दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में उत्तर प्रदेश के पहले तीन चरण के चुनाव के लिए टिकट बंटवारे को लेकर बैठक चल रही थी, तभी यहबात सामने आयी । पहले चरण में मथुरा में मतदान है। बताते हैं कि इस बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम पर चर्चा नहीं हुई। दरअसल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर पिछले दिनों खबर आई थी कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में बतौर बीजेपी उम्मीदवार सियासी मैदान में अपनी ताकत आजमाएंगे। इसके बाद से उनके अयोध्घ्या, गोरखपुर या मथुरा से चुनाव लड़ने की अटकलें लगाई जा  रही हैं । योगी आदित्घ्यनाथ ने कहा है कि इसका फैसला आलाकमान को करना है. उसका जैसा आदेश होगा वह उसे मानेंगे। इससे पहले बीजेपी के राज्यसभा सदस्य हरनाथ सिंह यादव ने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखकर सीएम योगी को मथुरा विधानसा सीट से चुनाव लड़वाने की अपील की थी। उनकी चिट्ठी सामने आने के बाद यह अटकलें तेज हो गई थी कि योगी आदित्यनाथ इसी सीट से आगामी चुनाव में ताकत दिखाएंगे। हरनाथ सिंह ने बीजेपी अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा था, ‘मुख्यमंत्री ने खुद ही घोषित किया कि पार्टी जहां से कहेगी मैं वहीं से चुनाव लड़ूंगा। इसलिए मैं आपसे विनम्र शब्दों में निवेदन करता हूं कि ब्रज क्षेत्र की जनता की विशेष इच्छा है कि योगी जी भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा से चुनाव लड़ें।
  कुछ दिन पहले की बात है जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि राज्य में श्80 फीसदी बनाम 20 फीसदीश् चुनाव होगा और भाजपा राज्य में सत्ता बरकरार रखेगी। इस बयान के बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की टिप्पणी राज्य में बहुसंख्यक हिंदू और अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी के बीच ध्रुवीकरण पैदा करना चाहती है। खुलकर कोई  भले ही न कहे लेकिन यह एक तथ्य है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सक्रिय रूप से हिंदू वोट को मजबूत करने की जुगत कर रही है। किसी भी राज्य में कोई धार्मिक या जातीय समूह राजनीतिक रूप से कितना ताकतवर या कमजोर है, इसका सही पता उस जातीय या धार्मिक समूह के विधानसभा में प्रतिनिधित्व यानी संख्याबल से ही चलता है। अगर हम उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के पिछले चुनावी प्रतिनिधित्व के आंकड़ों को देखें तो समझा जा सकता है कि विधानसभा में मुसलमानों का कब-कितना प्रतिनिधित्व रहा है। 
 उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के चुनावी  समीकरण में ऐतिहासिक रूप से उतार-चढ़ाव देखा गया है। आजादी के बाद दशकों तक मुसलमान कांग्रेस  के  साथ रहे। कांग्रेस के बड़े  वोट बैंक ब्राह्मण, दलित और मुसलमान माने जाते  थे। कांग्रेस  के ही नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मुसलमानों को अपने साथ जोड़लिया था लेकिन समाजवादियों से भी उनकी अच्छी  सांठगांठ थी लेकिन 1970 और 1980 के दशक में समाजवादी पार्टियों के उदय और कांग्रेस के पतन के बाद पहली बार विधानसभा में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व में वृद्धि देखी गई थी। सन 1967 में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 6.6ः था, वह 1985 में बढ़कर 12ः हो गया. हालांकि, 1980 के दशक के अंत में यानी 1991 में राज्य में यह 5.5ः तक कम हो गया। यहां ध्यान देने वाली बात है कि यह बीजेपी के उदय का दौर था।इसी समयावधि में चुनावों में मुसलमानों की समग्र भागीदारी भी घट गई। प्रतिनिधित्व में वृद्धि का दूसरा चरण 1991 के बाद शुरू होता है और 2012 में समाप्त होता है, जब मुस्लिम उम्मीदवारों ने 17ः विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की। अखिलेश यादव केनेतृत्व में 2012 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में आजादी के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीते थे। हालांकि, 2017 में भाजपा की जोरदार
जीत के बाद मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व का आंकड़ा फिर से 1991 के दौर वाला लौट गया।यूपी में सन 2017 के विधानसभा चुनाव में 23 मुस्लिम विधायक चुने गए, जबकि पिछले चुनावों में यह संख्या 69 थी।   उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा के वर्तमान प्रभुत्व ने दो क्षेत्रीय दलों यानी समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राजनीतिक प्रभुत्व को कमजोर किया है। कांग्रेस तो इन दोनों दलों  के चलतै ही कमजोर हो गयी थी, बाकी कमी भाजपा  ने पूरी कर दी। लोकतांत्रिक कांग्रेस  बनाने वाले आज सत्ता की मलाई भी काट रहे है।  आंकड़े बता रहे हैं कि सपा-बसपा के कमजोर होने से मुस्लिमों का यूपी विधानसभा में प्रतिनिधित्व कम हुआ है। सन 1996 और 2016 के बीच, इन दोनों दलों की राज्य की विधानसभा में सीटों की औसत हिस्सेदारी 63ः थी, जो 2017 में 16.4ः से कम हो गई. हालांकि, कांग्रेस के प्रभुत्व के समय में भी मुस्लिमों की भागीदारी बहुत अधिक नहीं देखी गई। आंकड़ों की मानें तो सपा और बसपा ने ही मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व करने का अवसर ज्यादा दिया। आंकड़ों की तरफ देखें तो1991 के बाद से भारतीय जनता पार्टी ने अब तक केवल 8 मुस्लिम उम्मीदवारों को ही टिकट दिया, जबकि हकीकत यह है कि बसपा और सपा समेत क्षेत्रीय पार्टियों से ही अधिक मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बने। इस तरह से देखा जाए तो जब भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होता है तो मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता है और जब उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय पार्टियां अच्छा करती हैं तो मुस्लिमों की भागीदारी बढ़ जाती है। इसी समीकरण ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है। योगी सरकार में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी छोड़ सपा का दामन थाम लिया है। बीजेपी के तीन और विधायकों के बीजेपी से इस्तीफा देने की खबरों ने यूपी में सपा और बीजेपी के बीच राजनीतिक मिजाज को गर्मा रखा है। हालांकि इनमें से 2 विधायकों ने इन बातों को महज अफवाह बताते हुए खंडन कर दिया है, वहीं कांग्रेस को भी इससे पहले एक झटका लग चुका है। बताया  गया कि कांग्रेस में रहे इमरान मसूद समाजवादी पार्टी का दामन थामने जा रहे हैं। चर्चा है कि समाजवादी पार्टी अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट शीघ्र जारी कर सकती है। स्वामी प्रसाद मौर्य के बाद जिन बीजेपी विधायकों ने पार्टी से त्यागपत्र दिया है, उनमें रोशन लाल वर्मा, ब्रजेश प्रजापति और कानपुर से विधायक भगवती सागर शामिल हैं। वहीं औरया जिले के बिधूना विधानसभा सीट से विधायक विनय शाक्य के इस्तीफे की भी चर्चा जोरों पर थी लेकिन उन्होंने इस बात का खंडन कर दिया है। उधर, शेखूपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक धर्मेंद्र शाक्य उर्फ पप्पू भईया ने भी बीजेपी से इस्तीफा देने की बात का खंडन किया है। उन्होंने कहा कि मैं पार्टी का अनुशासित सिपाही हूं और बीजेपी में ही रहूंगा। इसके अलावा कासगंज से भाजपा विधायक ममतेश शाक्य का बयान भी सामने आ गया है। उन्होंने सपा में जाने की सभी अटकलों को ख़ारिज कर दिया। 

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