उत्तराखण्ड को क्यों मिला नया राज्यपाल

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भाजपा शासित राज्य उत्तराखण्ड  में जब तीरथ सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था, तभी से सियासी कयास लगाये जा रहे थे।

भाजपा ने अचर्चित चेहरे पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बना दिया। इसके कुछ दिन बाद ही राज्यपाल पद से बेबी रानी मौर्य ने त्याग पत्र दे दिया। उसी समय कहा गया था कि बेबी रानी मौर्य को सक्रिय राजनीति में लाया जाएगा।

लगभग एक सप्ताह के बाद बेबी रानी मौर्य के स्थान पर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह को राज्यपाल बनाया गया है। नये राज्यपाल सेना से जुड़े रहे, इसलिए यह आम आदमी पार्टी को राजनीतिक जवाब भी माना जा रहा है जिसने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कर्नल अजय कोठियाल को बनाया है। नव नियुक्त राज्यपाल चार दशक तक सेना में रहे हैं। विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा पुख्ता तैयारी कर रही है। माना जा रहा है कि पार्टी के पास 7 से 8 लाख तक प्रशिक्षित वर्करों की फौज है और समर्पित कार्यकर्ताओं को अलग-अलग दायित्व सौंपा गया है। उत्तराखण्ड में सैनिकों और भूतपूर्व सैनिकों की बहुतायत है। राज्यपाल रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह सैनिक परिवार की सहानुभूति भाजपा के प्रति बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। 

 

भारतीय सेना से रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने उत्तराखंड के नए राज्यपाल के तौर पर 15 सितम्बर को शपथ ग्रहण की। एक औपचारिक समारोह के दौरान राज भवन में शपथ ग्रहण के दौरान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनकी कैबिनेट के प्रमुख सदस्य उपस्थित थे। राज भवन में हुए शपथ ग्रहण कार्यक्रम में सिंह को राज्य के हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस आरएस चौहान ने शपथ दिलवाई। इस दौरान सीएम धामी और उनके कुछ मंत्रियों के अलावा मुख्य सचिव एसएस संधू और डीजीपी अशोक कुमार जैसे खास अधिकारियों ने बधाई दी।

वास्तव में उत्तराखंड की राज्यपाल के तौर पर बेबी रानी मौर्य ने 8 सितम्बर को इस्तीफा दे दिया था। अपने कार्यकाल के पूरे होने के तीन साल पहले ही मौर्य के इस्तीफे के बाद उत्तराखंड के लिए नए राज्यपाल के तौर पर कई मेडलों और सम्मानों से नवाजे गए गुरमीत सिंह के नाम का ऐलान किया गया था। गत 15 सितम्बर को सिंह ने औपचारिक तौर पर उत्तराखंड के राज्यपाल के तौर पर शपथ ले ली। अपनी चार दशक की लंबी पारी में भारतीय सेना में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के साथ ही गुरमीत सिंह को कई तरह से नवाजा गया था। वह आर्मी के उप प्रमुख रहने के साथ ही, रणनीतिक फंग्ट कॉर्प्स के कमांडर रहे थे, जो कश्मीर में एलओसी के मामले देखने के लिए बना था। मिलिट्री कार्रवाई के अतिरिक्त महानिदेशक के तौर पर सिंह ने चीन संबंधी रणनीतिक और ऑपरेशनल मामलों का दायित्व भी संभाला। बॉर्डर और एलओसी मामलों के संबंध में रणनीतिक बैठकों के लिए वह सात बार चीन दौरे पर भी गए थे।  

उत्तराखंड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने जब अपने पद से इस्तीफा दिया और राज्यपाल ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेज दिया  तभी कहा जा रहा था कि अगले साल यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव में आगरा से मैदान में उतर सकती हैं। वह आगरा की मेयर भी रह चुकी हैं। राजभवन के अधिकारी ने बताया कि राज्यपाल ने व्यक्तिगत कारणों के चलते इस्तीफा दिया है। आपको बता दें कि बेबी रानी मौर्य ने 26 अगस्त, 2018 को उत्तराखंड के राज्यपाल पद की शपथ ली थी । उन्होंने तत्कालीन राज्यपाल केके पॉल की जगह ली थी। बेबी रानी मौर्य ने इसी साल अपने 3 साल का कार्यकाल पूरा किया है। वह उत्तराखंड में राज्यपाल के पद पर रहने वाली दूसरी महिला हैं। उनसे पहले मार्गरेट अल्वा उत्तराखंड की राज्यपाल रह चुकी हैं। गौरतलब है कि दो दिन पहले ही बेबी रानी मौर्य ने दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह के साथ मुलाकात की थी। इसके बाद ही उनके राज्यपाल पद से इस्तीफा देने की अटकलें लगने लगी थीं। साथ ही सियासी हलकों में यह खबरें भी आ रही थीं कि यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें पार्टी में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। इन अटकलों के बीच मौर्य ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

बेबी रानी मौर्य राज्यपाल का पद संभालने से पहले आगरा में महापौर के पद पर रही हैं। इसके अलावा वह राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य भी रह चुकी हैं। इसी वजह से उनके आगरा से विधानसभा चुनाव लड़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं। उत्तराखण्ड के राज्यपाल पद से बेबी रानी मौर्य के इस्तीफे के बाद ये कयास लगाये जाने लगे थे कि उनकी अगली भूमिका क्या होगी? दूसरे राज्यपालों की तरह वे अभी उम्र के उस पड़ाव पर नहीं हैं, जहां से रिटायरमेण्ट का रास्ता खुलता है। ऐसे में चर्चा ये चल पड़ी है कि बेबी रानी मौर्या को चुनाव से पहले यूपी में भेजा जायेगा। ऐसा करने के लिए उन्हें फिर से बीजेपी ज्वाइन करनी पड़ेगी। दो राज्यपाल ऐसा कर चुके हैं। हालांकि वे सक्रिय राजनीति में तो नहीं लौट सके लेकिन, बेबी रानी मौर्य के लिए इसकी संभावना बरकरार है।

यूपी के राज्यपाल रहे राम नाईक और राजस्थान के राज्यपाल रहे दिवंगत कल्याण सिंह ने दोबारा पार्टी ज्वाइन की थी। गवर्नर पद पर कार्यकाल पूरा होने के बाद दोनों ने औपचारिक तौर पर पार्टी की सदस्यता ली थी। यदि बेबी रानी मौर्य सक्रिय राजनीति में उतरती हैं तो वह दोबोरा पार्टी ज्वाइन करेंगी। बेबी रानी मौर्य आगरा की रहने वाली हैं और दलित समाज से हैं। इसीलिए ये कयास लगाये जा रहे हैं कि पार्टी उन्हें यूपी विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोटरों को गोलबन्द करने के काम में लगा सकती है। वे 1995-2000 तक आगरा की मेयर रह चुकी हैं। 2018 में उत्तराखण्ड की राज्यपाल बनने से पहले वे राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय थीं। भाजपा ने पिछले सालों में पिछड़े समुदाय के नेताओं को जमकर जोड़ा है, लेकिन दलित समुदाय का उसका गुलदस्ता उतना हरा-भरा दिखाई नहीं देता। बड़े और चर्चित दलित नेता पार्टी से अलग ही हुए हैं। उदित राज और सावित्री बाई फुले ने पार्टी छोड़ दी थी। हालांकि रामशंकर कठेरिया, कौशल किशोर, भानु प्रताप वर्मा, एसपी सिंह बघेल जैसे दलित नेता तो हैं ही। इन्हें तो हाल ही में केन्द्र में मंत्री भी बनाया गया है। ध्यान रहे तमाम सेंधमारी के बावजूद जाटव वोटरों ने मायावती के साथ एकजुटता बरकरार रखी है। दलितों में जाटव के बाद दूसरे नंबर पर सबसे बड़ी संख्या पासी समाज की है। धोबी, कोरी और वाल्मीकि तीसरे, चैथे और पांचवें नंबर पर आते हैं। ऐसे में बीजेपी की कोशिश है कि जाटव के अलावा बाकी दलित समाज को अपने साथ जोड़ा जाये। कौशल किशोर, बीएल वर्मा और बघेल को मंत्री बनाने के पीछे यही राजनीति दिखाई देती है। अब पूर्व राज्यपाल बेवी रानी मौर्य भी इसी कड़ी में शामिल होंगी। 

~अशोक त्रिपाठी

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