कहां छुपे हो सरकार, रोको हाहाकार! कोरोना संक्रमण पर राहुल गांधी की भविष्यवाणीे आंशिक नहीं बल्कि शत-प्रतिशत सही होती दिखाई दे रही

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अर्थव्यवस्था के बढ़ते हुए दबाव लाॅकडाउन से त्रास्त मजदूरों का लगातार पलायन एवं कोरोना संक्रमण के ग्रापफ पर लाकडाउन के घटते हुए असर ने सरकार को आगे के लिए लाॅकडाउन लाने से रोका या पिफर यूं कहिए कि एक बार पिफर से लफ्रपफाजी के महारथी नरेंद्र मोदी ने अपने शब्दजाल से देश को लाॅकडाउन की बजाए अनलाॅक शब्द देकर बहलाने का प्रयास किया है और एक के बाद एक चार बार अनलाॅक किया जा चुका है। यहां पर एक बात विशेष तौर पर ध्यान देने योग्य है कि जिस राहुल गांध्ी को भाजपा के आईटी सेल ने अपनी जादूगरी से देशभर में पप्पू साबित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, उनकी सार्वजनिक छवि को एक ऐसे व्यक्ति की छवि में बदल दिया, जिससे यथार्थ का कुछ भी अता पता नहीं है और राजनीति में केवल अपने खानदान या मां की वजह से ही है उन्हीं राहुल गांध्ी की भविष्यवाणी आज कोरोना संक्रमण के विषय में आंशिक नहीं बल्कि शत-प्रतिशत सही होती दिखाई दे रही है।
याद कीजिए कोरोना संक्रमण की शुरुआत में ही या उससे पहले भी राहुल गांध्ी ने कहा था कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए सरकार को बहुत सजग और सतर्क होकर कदम उठाने होंगे तथा अन्य देशों से सबक सीखते हुए न केवल अहतियाती कदम उठाने होंगे बल्कि कुछ ऐसी व्यवस्था भी करनी होगी कि कोरोना से होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके। लाॅकडाउन के लागू होने पर भी जब राहुल गांध्ी ने कहा था कि लाॅकडाउन इस समस्या का कोई हल नहीं है बल्कि यह केवल इसकी प्रक्रिया को ध्ीमा कर सकता है तब भाजपा एवं उसके समर्थकों ने राहुल गांध्ी की जमकर खिल्ली उड़ाई थी, मगर आज 4.0 लाॅकडाउन एवं चार अनलाॅक होने के बाद भी कोरोना से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या में लगातार भारी इजापफा हो रहा है आज की तारीख में प्रतिदिन लगभग 75,000 संक्रमण के केस देशभर में पाए जा रहे हैं और यह संख्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हालांकि रिकवरी की कापफी ऊंची है, लेकिन चिंतनीय प्रश्न यह है कि संक्रमितों की संख्या तो जबरदस्त तरीके से बढ़ती ही जा रही है और यह बिल्कुल इटली ब्राजील या अमेरिका की तर्ज पर हो रहा है। यदि अभी भी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं जब संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या हजारों से बढ़कर लाखों तक एवं लाखों से बढ़कर करोड़ों तक पहुंच सकती है। ऐसे में आप अस्पतालों में कितनी व्यवस्था कीजिए, कितने ही प्राइवेट अस्पतालों को टेकओवर कीजिए तब संक्रमित को भर्ती होने के लिए भी जगह नहीं मिलने वाली है और यदि ऐसे हालात आई तो देशभर में हाहाकारी स्थिति का होना अवश्यंभावी है।
अभी तक एक आम धरणा यह थी कि कोविड-19 के संक्रमण की वजह से हम लोग घरों में बंद कर दिए गए हैं और कोरोना का प्रकोप पिफर भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले 3-4 दिनों से लाॅकडाउन चार के बावजूद देश में प्रतिदिन संक्रमितों की संख्या 76,000 से 80,000 के बीच बढ़ रही थी और अब तक यह संख्या करीब 70 लाख का आंकड़ा तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही पार कर चुकी है जबकि इसमें दूर-दराज के गांव सीमावर्ती इलाकों पहाड़ों के आंकड़े तो शामिल ही नहीं हैं। साथ ही साथ इस बात का भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है कि कितने व्यक्ति लक्षण हीन तरीके से कोरोना से पीड़ित हुए एवं अपनी रोग प्रतिरोध्क क्षमता के चलते ठीक भी हो गए। यदि इन सब आंकड़ों को आध्किारिक आंकड़ों में जोड़ दिया जाए तो इसमें दो राय नहीं कि अभी तक भारत में कोविड-19 से प्रभावित होने वाले व्यक्तियों की कई करोड़ की संख्या पार कर चुकी होगी वह तो भला हो इस देश की जलवायु और यहां के मेहनती लोगों के शरीरों का जिनकी इम्यूनिटी कम खा कर भी और गम सह कर भी पश्चिमी देशों के मुकाबले कहीं बहुत अध्कि ज्यादा है अन्यथा तो सरकार के भरोसे अभी तक महामारी मच गई होती।

लाॅकडाउन एवं विभिन्न बंदिशों के चलते अर्थव्यवस्था पर भी कोरोना ने जबरदस्त नकारात्मक प्रभाव डाला है यहां तक कि सरकार के विशेषज्ञों ने जब राज्यों के साथ मंत्राणा की तो वहां से अर्थव्यवस्था की बदहाली एवं जीडीपी के लगातार गिरने के समाचार मिले। साथ ही साथ औद्योगिक उत्पादन लगभग ठप हो चला था जो अनलाॅक के बाद मरी मरी सी हालत में कुछ बहाल हुआ है। जहां पर उत्पादन कार्य चल भी रहे हैं वहां भी उत्पादित सामग्री को बाजार तक पहुंचाने का कार्य बड़ा मुश्किल हो रहा है साथ ही साथ सरकार द्वारा ट्रेन एवं बसें बहुत कम संख्या मे चलाने से भी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में पहुंच पा रहे हैं, जहां भी व्यापारियों से बात करें उनके मुरझाए हुए चेहरे थप्पड़ व्यापार आंखों से छलकते आंसू उनकी कमर टूट जाने के संकेत सापफ-सापफ करते हैं अब तो अर्थशास्त्रिायों ने भी इस बात को मान लिया है कि भारत की जीडीपी लगभग 23 प्रतिशत गिर चुकी है यानि जो एक बहुत बड़ी गिरावट ऊपर जाने के कोई खास संकेत नहीं मिल रहे हैं। अब भले ही प्रधनमंत्राी सीतारमन को एक दक्ष वित्त मंत्राी बताएं या उत्साह भरी बातें थी, लेकिन ढहती अर्थव्यवस्था गहरी चिंता पैदा कर रही है। रही सही कमी बेरोजगारी की मार पूरी कर रही है लगभग लगभग हर निजी संस्थान ने अपने कर्मचारियों की संख्या आध्ी या उससे भी कम कर दी है जो कर्मचारी काम पर है अभी उन्हें भी पहले के मुकाबले आध ही वेतन दिया जा रहा है यानि उद्योग 75 प्रतिशत की गिरावट झेल रहे हैं। निजी कर्मचारियों की तनख्वाह आध्ी हो गई है या उनकी नौकरियां जा रही हैं सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता रोक दिया गया है। उनका मनमाने तरीके से एक दिन का वेतन काट लिया गया है और 28 अगस्त को जारी सरकारी परिपत्रा के अनुसार सरकार 50 से 55 वर्ष के कर्मचारियों की सेवाओं का रिकाॅर्ड हर समय तैयार रखने के लिए कह रही है। आशंका यहां तक उभर रही हैं कि संभवत सरकार खर्चा कम करने के लिए ऐसे कर्मचारियों को जबरदस्ती रिटायर करने का मन बना रही है, जिनकी आयु 50 से 55 वर्ष के बीच या उससे ऊपर है अथवा में 30 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके हैं। ईश्वर करें यह सच न हो, मगर अगर सरकार ऐसा हृदयहीन कदम उठा लेती है, तो निचले एवं मध्यम स्तर के कर्मचारियों की परिवार भी भुखमरी के कगार पर पहुंच जाएंगे और लंबे समय तक शब्दों के जादूगर मोदी के शब्द और उन्हें सरकार के विरु( खड़े होने से नहीं रोक पाएंगे।

जब जनता सरकार के खिलापफ खड़ी होती है अच्छी-अच्छी सरकारों की चूलें हिल जाती हैं हम तो दुआ करेंगे कि ऐसा न हो पर क्या केवल दुआओं से बात बन पाएगी? ऐसी सरकार से क्या उम्मीद करें जो अनलाॅक के बहाने जनता को कुदरत के रहमों करम पर छोड़ दे और ध्यान रखने के लिए मीडिया में अजीबोगरीब चीजें चलाए। केवल पड़ोसी देशों ही नहीं, अपने से कहीं अध्कि ताकतवर देशों के साथ बिना किसी खास मुद्दे के तनाव पैदा करे और यु( जैसे हालात पैदा करके जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करे ऐसे में होना तो यह चाहिए हम अपनी व्यवस्था को संभालें, प्रशासन को चाक चैबंद करें। जनता को बेहतर से बेहतर सुविधाएं ही नहीं उनकी आशंकाएं दूर करने के लिए हर संभव प्रयास करें जनता को विश्वास सरकार उसका खजाना और प्रशासन हर तरह से और हर हाल में उनके साथ है, लेकिन हमारी सरकार को वाक चातुर्य के शस्त्रा से ही सब कुछ साथ लेना चाहती है बहुत दुखद है यह।

न जाने किस तरह सोच रहे हैं सरकार के विशेषज्ञ
जहां अनलाॅक से सरकार यह संदेश दे रही है कि वह अब जबरदस्ती लोगों को घरों में बंद नहीं रखेगी। वहीं इस कदम से मोदी सरकार ने विपक्ष के उन नेताओं की भी बोलती बंद करने का प्रयास किया है जो लगातार लाॅकडाऊन बढ़ाने पर उंगलियां उठा रहे थे और सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे थे यानि अनलाॅक लाकर सरकार ने आर्थिक के साथ-साथ ही राजनीतिक लक्ष्य भी साध्ने की कोशिश की है। अनलाॅक का मतलब यह बताया गया कि अब कंटेनमेंट जान को छोड़कर बाकी जगहों पर बाजार और अन्य गतिविध्यिां चल सकेंगी पर ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने सारे प्रतिबंध् उठा ही दिए हैं। कहीं बाजार हफ्रते में एक दिन तो कहीं 2 दिन और कहीं कहीं 333 तक बंद है। दुकानों के खुलने का समय निश्चित है पुलिस की सख्ती जारी है ऐसे में ने दुकानदार खुलकर दुकानदारी हरिदास बाजार में आप आ रहे हैं यानि पूरी तरह लाॅकडाउन है और ना ही बाजार को आजादी दी गई है। सीध्े-साध्े शब्दों में कहें तो बाजार को आध तीतर आध बटेर करके छोड़ दिया गया है भाई ऐसे में अर्थव्यवस्था बचेगी और नहीं संक्रमण से बचाव हो पाएगा पता नहीं सरकार के विशेषज्ञ किस तरह से सोच रहे हैं।

सबकुछ खुला मगर शिक्षा बंद
स्कूल-कालेज और शैक्षणिक संस्थान खोले जाने पर पफैसला नहीं ले पा रही है संक्रमण के नाम पर शिक्षा कोमा में है मगर जिद के लिए नीट और जीट कराए जा रहे हैं। माॅल खुले हैं मेट्रो और, जिम, भी खुल गए। अंतर्राज्यीय परिवहन पर रोक नहीं रही, राज्य चाहें तो इस परिवहन को नियंत्रित कर सकता है। कुल मिलाकर अनलाॅक का सीध सीध सा अर्थ यह है कि अब सरकार आपको अपने बंध्नों के तहत सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सीध्े-सीध्े अब आप पर ही डाल रही है या यूं कहिए कि सरकार का मानना है कि उसने इतना समय आपको कोरोना वायरस के साथ जीने की ट्रेनिंग देने के लिए लिया था।

चिकित्सा सेवाएं भी बदतर हालत में
साथ ही साथ उसने आने वाली भयंकरतम परिस्थितियों का भी आकलन इस मध्य उन्होंने किया जिससे कि यदि यहां पर हालात बिगड़ते भी हैं तो भी पर्याप्त मात्रा में स्वास्थ्य सुविधएं एवं अस्पताल आदि मुहैया कराई जा सके पर सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय आइसोलेशन सेंटर्स में न गुणवत्ता पूर्वक भोजन है ना व्यवस्थाएं वहां जाने वाले बता रहे हैं कि यदि कोई पाॅजिटिव न भी हो तो भी वहां से पाॅजिटिव होकर लौटे और इस से भी ऊपर जरा सा बुखार होते ही सरकारी एजेंसियां जबरदस्ती लोगों को इन सेंटेंस में भेड़ बकरियों की तरह भेजने में जुटी हैं आरोप तो यह भी है कि सरकार से मिलने वाले बजट की बंदरबांट करने के लिए यह सब हो रहा है।
अब तो खुदा ही खैर करे, राम ही बचाए क्योंकि सरकार तो संभ्रम की स्थिति में है। खुद उसके मंत्राी संक्रमित हो रहे हैं, उत्तर प्रदेश के तो दो मंत्रियों की मृत्यु तक हो चुकी है।  खुद गृहमंत्राी एम्स में भर्ती रहे, कितने ही डाक्टर, नर्स, पुलिस वाले संक्रमण का शिकार हो चुके हैं यानि जो सरकार खुद को ना बचा सके वह आम जनता को क्या और कैसे बचाएगी?  सवाल तो बहुत हैं, आरोप भी बेहिसाब हैं, लेकिन जबान पर लगाम रखना ही बेहतर है, क्योंकि यह कट्टर विचारों वाली सरकार है जिसे अपने खिलापफ बोलना कतई नहीं सुहाता। वह चैनलों पर छिपा हुआ प्रतिबंध् लगाती है उनके विचारों को प्रभावित कर सकती है और जैसा चाहे वैसा ही प्रसारण करवा सकती है। चलिए, खैर यह हिंदुस्तान है और यह मुल्क बार-बार लड़खड़ा कर, गिर कर, बिखर कर भी खड़ा होता रहा है और अपना अस्तित्व बचाए हुए है। इस बार भी बचा ही लेगा हिंदुस्तान खुद को, सरकार कुछ करे या ना करे।

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I think all aspiring and professional writers out there will agree when I say that ‘We are never fully satisfied with our work. We always feel that we can do better and that our best piece is yet to be written’.
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