अखिलेश यादव के चुनावी समीकरण की क्या है रणनीति

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उत्तर प्रदेश में सत्ता हथियाने के लिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस बार यादव, मुस्लिम और दलित का समीकरण बनाने की रणनीति बनायी है। यह समीकरण निश्चित रूप से टक्कर दे सकता है। दलित वोट पर निगाह से बसपा प्रमुख मायावती भी चिंतित हैं और वे भाजपा के साथ हर मामले में सपा पर भी निशाना साधती हैं। उधर, अखिलेश यादव बसपा से नाराज लोगों को अपने साथ जोड़ रहे हैं। इस समीकरण के चलते ही उन्होंने राजा भैया की पार्टी से तालमेल की जरूरत नहीं समझी है। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी देश का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवार है। मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी को बनाया था और कांशीराम की पार्टी बसपा से सहयोग लेकर यूपी में सरकार भी बनायी थी। मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में तीन बार मुख्यमंत्री रहे और इस बीच उन्होंने सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ा। यादव और मुस्लिम उनके सबसे बड़े वोट बैंक रहे हैं। इस बार अखिलेश यादव इस वोट बैंक में दलितों को भी जोड़ना चाहते हैं।


यही कारण है कि बसपा से निकाले गये टॉप नेताओं का सबसे बड़ा ठिकाना सपा बन रही है। इन्द्रजीत सरोज तो पहले से ही हैं। हाल ही में 6 विधायकों के साथ लालजी वर्मा और रामअचल राजभर ने भी सपा का ही दामन थामा है। कभी बीजेपी से सांसद रहीं दलित लीडर सावित्री बाई फुले से उन्होंने गठबंधन किया है। आजाद समाज पार्टी (भीम आर्मी ) के चन्द्रशेखर रावण से उनकी बातचीत चल रही है। सवाल उठता है कि दलित समुदाय अखिलेश यादव को कितना अपना पायेगा। यूपी के गांव-गांव में पिछड़ों और दलितों की कई जातियों के बीच एका नहीं रहा है। यही वजह रही कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन कोई करिश्मा नहीं कर पाया। सपा के वोट तो बसपा को गये, लेकिन बसपा के वोट सपा को ट्रांसफर नहीं हो पाये। कुछ दलित नेता अब इस संबंध को नये सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। सावित्री बाई फुले ने कहा कि दलित समाज के मन में मायावती की वो बात घर कर गयी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि सपा को हराने के लिए जरूरत पड़ी तो वो बीजेपी का भी साथ देंगी। इसके अलावा संविधान को खत्म करने की जो साजिश बीजेपी और संघ कर रहा है उसके खिलाफ मायावती चुप हैं। ऐसे में अखिलेश यादव ही एक विकल्प बच जाते हैं।

 
हालांकि अखिलेश यादव के लिए दलित समाज को अपने धागे में बांध पाना आसान नहीं होगा। गांव-गांव में दोनों का गठबंधन कभी भी नेचुरल नहीं रहा है। वैसे भी मायावती को हल्के में लेना भूल ही होगी। इसीलिए अपना वोटबैंक सहेजने के लिए वे आरक्षित सीटों पर मजबूती से लड़ने का संदेश बहुजन समाज को दे रही हैं। वे लगातार बता रही हैं कि बाकी सीटों के साथ साथ अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 84 सीटों पर फतह के लिए वे कितनी मेहनत कर रही हैं। शायद वे ये संदेश देना चाह रही हों कि दलित नेताओं को विधानसभा पहुंचाने के लिए वे कितनी जद्दोजहद कर रही हैं।
यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के मथुरा के ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि’ को लेकर बयान पर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने पलटवार किया है। बसपा प्रमुख ने ट्वीट कर कहा कि केशव प्रसाद मौर्य के उत्तर प्रदेश विधानसभा आमचुनाव के नजदीक दिया गया बयान कि अयोध्या व काशी में मन्दिर निर्माण जारी है अब मथुरा की तैयारी है, यह भाजपा के हार की आम धारणा को पुख्ता करता है। इनके इस आखिरी हथकण्डे से अर्थात हिन्दू-मुस्लिम राजनीति से भी जनता सावधान रहे। मायावती बीजेपी सरकार पर मायावती भले ही बहुत आक्रामक न दिख रही हों लेकिन, सपा पर वो ज्यादा अटैकिंग हैं। सत्तारूढ़ दल पर निशाना साधने के साथ-साथ वो सपा पर निशाना साधना नहीं भूलतीं। मायावती ने 8 नवंबर को ये भी कहा था कि सपा ने हमेशा से ही दलित महापुरुषों और गुरुओं का तिरस्कार किया है। उन्होंने सपा के दलित
प्रेम को नाटकबाजी तक कहा है। प्रयागराज में दलित समाज के 4 लोगों की हत्या पर उन्होंने कहा कि लगता है कि बीजेपी सरकार भी सपा सरकार के नक्शेकदम पर चल रही है। अखिलेश यादव जानते हैं कि पिछड़ों के साथ यदि दलितों के वोट जुड़ जायें तो विजयश्री मिलनी तय हो जायेगी। इसीलिए उन्होंने बहुजनों को साधना शुरु किया है। वे अपनी हर चुनावी रैली में ये दिखाना चाहते हैं कि जिस अभियान को बसपा सुप्रीमो मायावती ने त्याग दिया है उसे उन्होंने अपना लिया है।
इस प्रकार यूपी मिशन 2022 में समाजवादी पार्टी दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने की लगातार कोशिश करती दिख रही है।

 

 

ऐसी ही एक कोशिश गोरखपुर में दिखी, जहां सपा के राष्ट्रीय महासचिव इन्द्रजीत सरोज ने दलित वोटर्स के साथ जनसंवाद किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि आज बसपा के 6 पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सपा में हैं। सपा ही एक ऐसी पार्टी है जो दलितों का हित सोचती है। 


सरोज के भाषण में बसपा से बाहर आने का दर्द साफ दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा, ‘छात्र जीवन से ही मैं बसपा में लगा था। मायावती का उदय 1995 में हुआ था, जबकि हमलोग 1983 से इससे जुड़े थे। मान्यवर कांशीराम जो मिशन लेकर चले थे वो पूरा नहीं हो रहा है। मायावती उससे भटक गई हैं। कांशीराम ने जो विचारधारा है उसी को लेकर आज हम चल रहे हैं। वर्तमान में उस विचारधारा को लेकर अखिलेश यादव ही चल रहे हैं।’ बसपा के छह पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के सपा में शामिल होने पर सरोज ने कहा कि बसपा के बाद सपा की ही विचारधारा उसके नजदीक है। आज दलित चैराहे पर खड़ा है। वो सिर्फ सपा की तरफ आ रहा है। सबका भरोसा सपा पर है। सबको भागीदारी दे रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भाजपा बिना दांत के ही शेर पैदा करती है। ये सांसद , विधायक, मंत्री बना देते हैं पर उसको पावर नहीं देते हैं, वो किसी का काम नहीं करा सकते हैं। भाजपा में वन मैन शो है। भाजपा के नेता झूठ बोलते हैं, न तो नौकरियां मिली, न महंगाई कम हुई, न गुंडाराज कम हुआ, किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही थी वो भी नहीं हुआ।

~अशोक त्रिपाठी

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