उत्तराखण्डः दिग्गज नेताओं को कैसे साधेंगे युवा धामी ?

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  • उत्तराखण्डः दिग्गज नेताओं को कैसे साधेंगे युवा धामी ?
  • क्या मंत्रिपरिषद में भी करेंगे फेरबदल
  • नौकरशाही को काबू रखना भी आसान नही
  • चुनावी साल में घोषणाओं का अंबार, कैसे पाएगे पार


मौहम्मद शाहनजर
देहरादून।
संवैधानिक अड़चन के चलते उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री के पद से विदा हुए तीरथ सिंह रावत की जगह लेने वाले युवा पुष्कर सिंह धामी के सामने चुनौतियां भी कम नही है। धामी युवा और दो बार के विधायक है, जबकि भाजपा में धामी की उम्र का सियासी अनुभव रखने वाले नेताओं-महाबलियों की पूरी फ़ौज है। मंत्रीमंडल में शामिल सतपाल महाराज केंद्र सरकार में राज्यमंत्री रह चुके हैं, डॉ. हरक सिंह रावत, बंशीधर भगत व बिशन सिंह चुफाल यूपी के जमाने में भी मंत्री रह चुके है, वही यशपाल आर्य भी उत्तर प्रदेश में दो बार विधायक रहने के साथ उत्तराखण्ड में स्पीकर-कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के साथ-साथ लगातार मंत्री बनते रहें है। आठ बार के विधायक हरबंस कपूर, विद्वान कहे जाने वाले मुन्ना सिंह चौहान, स्पीकर प्रेमचंद अग्रवाल,सुबोध उनियाल, गणेश जोशी, रेखा आर्य, अरविंद्र पाण्डे, डॉ. धन सिंह रावत, बलवंत सिंह भौर्याल, हरभजन सिंह चीमा व राजेश शुक्ला सरीखे दिग्गजों को युवा धामी कैसे साधेंगे यह भी बड़ा सवाल है। क्या धामी अकेले ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे,या उनके साथ मौजूदा मंत्रिपरिषद के सदस्य भी शपथ लेंगे, यह कल ही साफ हो पाएगा।    


अगर मौजूदा मंत्रिमंण्डल में बदलाव किया गया तो, भी असंतोष-गुटबाजी बढ़ने का खतरा होगा। धामी के सामने सबसे बड़ी समस्या नौकरशाही को काबू में करने की होगी। त्रिवेन्द्र-तीरथ की नाव डुबोने में नौकरशाहों की भी भूमिका गहरी मानी जाती है। कहा जाता है कि घोड़े की तरह अफसरशाही भी अपने सवार का मिजाज-ज्ञान भांप कर चाल चलती है। उनको धामी किस कदर और कितनी क्षमता से काबू में रख के काम ले पाते हैं, ये अहम सवाल होगा। वैसे भी यह चुनावी साल है, घोषणाओं का अंबार लगा हुआ है, जाते-जाते तीरथ भी नौकरियों का पिटारा खोल कर गये है। विजन डाक्यूमेंट-त्रिवेंद्र-तीरथ और अपने कितने वादों को धामी पूरा कर सकेंगे यह भी देखना होगा। ये भी तय है कि अब मोदी के नाम और धामी के चेहरे पर चुनाव होगा। धामी अगर पार्टी को सत्ता में लौटाते हैं तो मुख्यमंत्री फिर उनके अलावा कोई ओर नहीं बनेगा। इस पहलू को देखते हुए भाजपा में खेमे बाजी का भी खतरा बना रहेगा। मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे दिग्गजों की चाल भी देखने लायक होगी। 


न विधायक बने, न विस सत्र कराया, फिर भी मुख्यमंत्री 
देहरादून।
संवैधानिक कारणों से शुक्रवार को इस्तीफा देने वाले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत अपने बयानों के साथ-साथ कई और वजहों से भी याद रखे जाएंगे। तीरथ ऐसे पहले 
मुख्यमंत्री रहे, जो मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान विधानसभा के सदस्य नहीं रहे। उत्तराखण्ड में अब तक के मुख्यमंत्रियों के रूप में उनका कार्यकाल (115 दिन) सबसे छोटा रहा। यही नहीं, वे राज्य के ऐसे मुख्यमंत्री भी रहे, जिनके कार्यकाल में एक भी विधानसभा सत्र आहुत नही हो सका। तीरथ शुक्रवार दोपहर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को विधानसभा उप चुनाव में आ रही संवैधानिक अड़चन के कारण अपने इस्तीफे की पेशकश का पत्र सौंप देहरादून लौट आए थे। तीरथ ने रात्रि सवा 11 बजे राजभवन जाकर राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को इस्तीफा सौंपा था,राज्यपाल ने उनका इस्तीफा मंजूर करते हुए नए मुख्यमंत्री के कार्यभार संभालने तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में बने रहने को कहा है। पार्टी विधायक दल की बैठक में पुष्कर सिंह धामी को नया मुख्यमंत्री चुन लिया गया है। 

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