यूपी सियासतः शह-मात का खेल

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सियासी खेल भी अजब-गजब होते हैं जनता इनके सियासी खेल का हिस्सा होती है। इसमें जनता यह नहीं समझ पाती कि हमारी बात कर कौन रहा है ? या हमारी भलाई के लिए कौन काम करना चाहता है ? यह ऐसे सवाल हैं, जिसका जवाब जनता चाहती तो है लेकिन उसे कोई देने को तैयार नहीं है या यूं भी कह सकते हैं कि जनता उनके सियासी मकड़जाल में इस तरह फंस जाती है कि यह भूल जाती है कि हम इनसे कोई सवाल करे कि यह सब हो क्या रहा है। हम बात कर रहे हैं यूपी की सियासत की, जहां अपना-अपना वर्चस्व कायम करने के लिए सियासी संग्राम हो रहा है।

 

अब इस सियासी संग्राम में कौन सियासी दल बाजी मारेगा यह तो अभी साफ नहीं हो पा रहा है और ना अभी होगा, मुद्दा है योगी सरकार की नाकामियों को जनता के सामने रखना नाकामियां होना अपनी जगह है वो है। उसमें जो होड़ मची है कि मैं आगे निकल जाऊं कि मैं आगे निकल जाऊं इसमें कुछ दल ऐसे दिखने लगे हैं, जिन्हें कहा जा रहा है बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना। हां लेकिन ये कहा जा सकता है सभी सियासी खिलाड़ी अपने लक्ष्य को साधने के लिए दिल खोलकर मेहनत कर रहे हैं। योगी सरकार की चूलें हिलाने में कांग्रेस, बसपा, सपा व आप लगे हैं, यूपी के सियासी संग्राम में शह और मात के खेल की हुई शुरुआत हो चुकी है। योगी सरकार ने भी चुनावी पत्ते पफेंटना शुरू कर दिए हैं। यूपी के सियासी सफर में आम आदमी पार्टी का यूपी और उत्तराखंड की सियासत में भागीदारी करना मोदी की भाजपा की शतरंज की चाल का हिस्सा माना जा रहा है, गोदी मीडिया और उसके सारथी आप की बीन बजाते घूम रहे हैं। आगामी 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिए सभी सियासी दलों ने अपने सियासी तरकश से तीर छोड़ने शुरू कर दिए हैं अब देखना है कि कौन सियासी दल बाजी अपने नाम कर यूपी सत्ता को कब्जाने में कामयाब होगा या मोदी की भाजपा विपक्ष को आपस में लड़ा अपनी सत्ता बचाने में कामयाब हो जाएगी। खैर यह तो 2022 के विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद पता चलेगा। यूपी की सियासत में पिछले तीन दशकों से जातिवादी राजनीति हावी रही है। 2014 के आम चुनावों के बाद धर्मिक आधरित सियासत हावी होने के बाद यूपी की सियासत भी इसी रंग में रंग गई है। अब देखना है क्या धर्म आधरित सियासत का अंत होने जा रहा है, क्योंकि जिस तरह से यूपी सहित देश के हालात खराब हैं ना रोजगार है, ना कारोबार है, ना कानून-व्यवस्था की हालात ठीक है हर तरफ त्राहि-त्राहि है यह बात अपनी जगह है। इन सब हालातों को ध्यान में रखते हुए सियासी दल जनता को धर्मिक आधारित दौर की कमियों को जनता के सामने रख उनको यह अहसास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि धर्मिक आधारित सियासत ने देश और देश के सबसे बड़े राज्य यूपी को गड्ढे में धकेलने का काम किया है, जिसको हमें जनता के सहयोग से मिलकर रोकना है। अब यह तो वक्त बताएगा कि हालात सुधरगे या जनता यह सब अनदेखा कर उसी ढर्रे पर चलेंगी जिस ढर्रे पर वह 2014 से चल रही हैं। खैर हम बात कर रहे थे सियासी दलों की जो मोदी की भाजपा को चुनौती देने का काम कर रहे हैं या दिखावा कर मोदी की भाजपा की पिछले दरवाजे से मदद कर रहे हैं। क्या दिल्ली की दस साल पुरानी पार्टी आम आदमी पार्टी वास्तव में यूपी में चुनाव लड़ने के लिए आई है या इसके पीछे कोई राजनीतिक नूरा कुश्ती है?

 

यह ऐसा सवाल है जिस पर सियासी जानकार गहन मंथन कर रहे हैं। बस कुछ ही समय में यूपी और उत्तराखंड में चुनावी बिगुल बज जाएगा उसी के मद्देनजर सियासी दलों ने अपने-अपने पहलवान सियासी अखाड़े में उतार दिए हैं। दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने यूपी और उत्तराखंड में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है दोनों राज्यों में 2022 के शुरुआत में ही चुनाव संभावित है।


आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद ठाकुर संजय सिंह यूपी में सक्रिय हो गए हैं और अलग-अलग मुद्दों पर यूपी की योगी सरकार को घेरते दिखाई दे रहे हैं मुद्दा चाहे जो हो उसमें आप सांसद सामने नजर आ रहे हैं। ऐसा लग रहा जैसे योगी सरकार भी यह प्रयास कर रही है कि आम आदमी पार्टी यूपी सियासत के संग्राम में पिफट हो जाए। योगी सरकार ने अनावश्यक तरीके से आप सांसद ठाकुर संजय सिंह के खिलापफ एक के बाद एक दस एपफआईआर दर्ज करा आप पार्टी को विपक्ष के तौर पर फिट करने की कोशिश की है यह बात अलग है कि वह जनता में अपनी पैंठ बना पाती है या नहीं यह सियासी गर्भ में छिपा है। सियासी पंडित ऐसे कयास क्यों लगा रहे हैं इसकी वजह है जो साफतौर पर नजर आती है आप सांसद के विरु( वैसा सत्ता का नशा नहीं दिखता जैसा यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को लेकर दिखता है सरकार की दमनात्मक कार्रवाई एवं जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध कांग्रेस के नेता अजय कुमार लल्लू को आए दिन सरकार और उनकी पुलिस गिरफ्रतार करती रहती है कभी नजर बंद कर लेती है कभी पार्कों में ले जाकर शाम को छोड़ देती है।

लाॅकडाउन के दौरान भूखे प्यासें सड़क के द्वारा पैदल अपने घरों को जा रहे गरीब मजदूरों को बसों से भेजने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की राष्ट्रीय महासचिव यूपी की प्रभारी श्रीमती प्रियंका गांधी के प्रयासों से राजस्थान सरकार से एक हजार बसे मंगा कर यूपी सरकार को देनी चाही थी, जिससे मजदूर पैदल ना जाकर बसों से चले जाए, लेकिन योगी सरकार ने उनको फिटनेस की कमी बताकर लेने से इन्कार कर दिया था, जबकि कांग्रेस और राजस्थान सरकार का कहना था कि सभी बसों की फिटनेस चेक कर ही यूपी सरकार को भेजी गईं थी, लेकिन योगी सरकार ने उन सब दलीलों को खारिज कर कांग्रेस के द्वारा मजदूरों के लिए दी गईं बसों को नहीं लिया गया था और ना ही खुद योगी सरकार ने मजदूरों के लिए कोई प्रबंध् किया था। मजदूर पैदल ही अपने-अपने घरों तक गए थे उनके पैरों में छाले पड़ गए थे, लेकिन योगी सरकार ने उनके जख्मों को नजरअंदाज कर उनको अपने हाल पर छोड़ दिया था और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को गैर फिटनेस बसे देने के आरोप में एपफआईआर दर्ज कर जेल भेज दिया था, जिसकी वजह से अजय कुमार लल्लू को एक महीने से अधिक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा था। इन सब मुद्दों पर फोकस रखते हुए सियासी जानकार कहते हैं कि प्रदेश सरकार और आप में सियासी साठगांठ है या हो गईं है? अन्ना को आगे कर 2013 में आरएसएस और मोदी की भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाया उसमें से ही आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ यह भी हम सब जानते हैं दोनों की रणनीति एक जैसी है इस कड़ी में एक नाम और भी है जो अन्ना आंदोलन की मजबूत सिपाही रही रिटायर आईपीएस किरण बेदी मोदी की भाजपा की सरकार बनते ही किरण बेदी मोदी की भाजपा में शामिल हो गईं थी। अन्ना आन्दोलन सीएजी की रिपोर्ट को आधार बनाकर खड़ा किया गया था जिसमें सीएजी रहे विनोद राय ने टूजी स्पेक्ट्रम के आवंटन में भ्रष्टाचार होना बताया था। मोदी सरकार बनते ही सीएजी रहे विनोद राय को बैंकिंग बोर्ड आफ इंडिया का चेयरमैन बनाकर इनाम दे दिया गया था। यह बात अलग है इस षड्यंत्रकारी  रिपोर्ट में जिस कथित घोटाले के आरोप लगाए गए थे उसमें हुई जांच में किसी आरोपी के खिलापफ कोई सबूत नही मिलने की वजह से सीबीआई की अदालत से सभी आरोपियों को बरी कर दिए है, जबकि यहां इसका उल्लेख करना भी जरूरी है कि यह सभी आरोपी मोदी सरकार में बरी हुए है सीबीआई ;सरकारी तोताद्ध भी कुछ नहीं कर पाया। इस आन्दोलन को खड़ा करने में विवेकानंद पफाउंडेशन की बड़ी भूमिका रही थी, जिसकी स्थापना 2009 में की गईं थी अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, रामदेव को एक मंच पर लाने में और टीम अन्ना बनाने में विवेकानंद फाउंडेशन ने बड़ा किरदार निभाया इसके कर्ताधर्ता अजित डोभाल है जो आज प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार है। ऐसे और भी कई सवाल हैं जो सीधे आम आदमी पार्टी और मोदी की भाजपा से साठगांठ होने की ओर इशारा करते हैं कई ऐसे मुद्दों पर आप की कयादत अरविन्द केजरीवाल मोदी की भाजपा से विपक्ष की भूमिका में बात करते नजर नहीं आए चाहे वह इस आरोप की बोछारों से घिरी कि मोदी की भाजपा दिल्ली दंगे भाजपा द्वारा प्रायोजित थे या अनुच्छेद 370 हटाने का मामला रहा हो नहीं तो जो केजरीवाल नगर निगम में जमादार को हटाने के खिलाफ धरने पर बैठ जाते हों या बैठने की धमकी देते हों वह दिल्ली दंगों की आग में जलती-बुझती रही और ध्रना मास्टर खामोशी की चादर ओढ़े सोते रहे यह बात गले से नीचे नहीं उतरती कपिल मिश्रा के खिलापफ एफआईआर ना होना क्या दर्शाता है कोर्ट का दिल्ली पुलिस की जांच पर सवाल उठाना और केजरीवाल की खामोशी क्या कहती है? कोविड-19 को लेकर भी केन्द्र सरकार की स्ट्रेटेजी पर अरविन्द केजरीवाल का केन्द्र से कोई नाराजगी ना दिखाना। यही सब सवाल है जो यूपी और उत्तराखंड के सियासी संग्राम में कूदने पर आप की नीयत पर शक की गुंजाइश पैदा कर रहे है।

~तौसीफ कुरैशी

(लेखक शाह टाइम्स समूह के समाचार संपादक हैं)

I think all aspiring and professional writers out there will agree when I say that ‘We are never fully satisfied with our work. We always feel that we can do better and that our best piece is yet to be written’.
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