आज के दौर में राजनीतिक प्रवक्ताओ की बहसों का स्तर

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देश की राजनीती हमेशा से ही लोगो के लिए एक मुद्दा रही हैं एक दौर था जब लोग सलीके के साथ अपनी बात रखते थे ओर सुनने वाले के दिल ओर दिमाग में एक शीरी सी घुल जाती थी। उस दौर में जब राजेंद्र प्रसाद साहब, नेहरू साहब, ज़ाकिर हुसैन साहब आदि अपनी तक़रीर शुरू करते थे तो लोग ठहर जाते थे। ज़माना बदलता गया, वक़्त गुज़रता गया ओर हमारी राजनीति भी बूढी होती चली गयी। मुझे याद हैं अटल जी का वो शायराना अंदाज़, चौधरी चरण सिंह साहब की वो रोबदार गुफ्तगू , चौधरी अजीत सिंह साहब की वो समझदारी से भरी मुद्दों पर चर्चा ओर हमारे भाई डॉक्टर अम्मार रिज़वी साहब की बेहद ख़ुलूस से की गयी यादगार बाते।  

हमारी हिंदुस्तानी राजनीति ने एक दौर जी लिया हैं ओर अब यह बूढी हो चली हैं ओर मेरा मानना हैं उम्र के साथ अदब, तहज़ीब,खुलूस ओर सलीक़ा बढ़ जाता हैं। मगर आज के दौर में पार्टियों के नुमाइंदो (परवक्ताओ) का बात रखने का सलीक़ा बदल सा गया हैं, आज सामने बैठे पार्टियों के नुमाइंदो को चुप कराने के लिए दलील ना देकर ऊंची आवाज में बोलना, गलत अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करना ओर बोलते बोलते मौज़ू से भटक जाना एक आम सा मंज़र हो गया हैं। हमारी हिंदुस्तानी राजनीति का यह नया चेहरा हैं। पार्टियों के नुमाइंदे सज-धज कर टीवी कैमरों के सामने स्टूडियो में बैठ जाते हैं और देश-दुनिया के तमाम मुद्दों पर चर्चा करते है।

पार्टियों में पहले भी नुमाइंदे (प्रवक्ता) हुआ करते थे मगर उस वक़्त इनकी तादाद चुनिंदा हुआ करती थी। लेकिन निजी समाचार चैनलों के बाद से हर चैनल में बहस और चर्चा के लिए नुमाइंदो की ज़रूरत पड़ने लगी ओर निजी चैनलों की तादाद के साथ साथ नुमाइंदो की भी गिनती बढ़ती चली गयी। 

सत्ताधारी दलो के नुमाइंदे अपनी बात रखने के लिए आने लगे तो ज़रूरत बड़ी विपक्ष के नुमाइंदो की। इस तरह इन लोगो की बहस का टीवी चैनलों पर चलन शुरू हो गया। हमारे वक़्त में न्यूज़ चैनल्स पर सिर्फ खबरे आती थी इन बहसों को दौर भी नहीं था, हर एक पार्टी चुनिंदा नुमाइंदे रखती थी जो केंद्र ओर राज्यों के अलग अलग होते थे ओर अपनी सरकारों की बाते आम जनता तक पहुंचाया करते थे। 

आज के दौर में ज्यादातर घरो में समाचार चैनल देखे जाते हैं, इसलिए आम राय बनाने में इन चैनलों में होने वाली बहस की अहमियत को इनकार नहीं किया जा सकता। हमे टीवी पर होने वाली बहसों का स्तर बेहतर करना होगा, वरना ये नुमाइंदे ऊंची आवाजो में बोलते ओर बहस जीतते हुए नजर तो आएंगे, लेकिन इससे देश की कोई भी परेशानी सुलझती नहीं दिखेगी ओर एक दिन ऐसा आएगा की लोगो का दिल इन बहसों को देखने का नहीं हुआ करेगा। 

~स्वर्गीय डॉक्टर सैयद मौलाना शराफत हुसैन काज़मी साहब ( पूर्व उपाध्यक्ष शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ऑफ इंडिया व राष्ट्रीय महासचिव, राष्ट्रीय लोकदल ) की डायरी से

I think all aspiring and professional writers out there will agree when I say that ‘We are never fully satisfied with our work. We always feel that we can do better and that our best piece is yet to be written’.
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