सहारनपुर की सियासत के सूरमा समझने वाले लेट गए हैं सपा बबुआ के सामने

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सहारनपुर सियासत में कभी-कभी ऐसा वक़्त भी आ जाता है कि वह अपने उस वजूद से गिरकर समझौता करने के लिए विवश कर देता है यह बात अलग है कि उसका वजूद उतना है भी या नहीं जितना वह समझता है।सहारनपुर की सियासत में अपना दबदबा होने का दावा करने वाले एक परिवार के सदस्य सपा के मालिक के सामने इस तरह गिड़गिड़ा रहे हैं जैसे उनकी कोई औक़ात नहीं हैं और सपा के मालिक भी उसकी इस मजबूरी को समझ कर ख़ूब तफ़रीह अंदाज में मज़ा ले रहे हैं कभी यह परिवार सहारनपुर के हर चुनाव को अपने इर्द-गिर्द घूमाते दिखाई देता था लेकिन आज हालात विपरीत हों गए हैं एक सीट या दो सीटें माँग रहे हैं उस पर भी सपा के मालिक किन्तु परन्तु कर रहे हैं।सहारनपुर के सियासी गलियारों में इस परिवार का सदस्य काफ़ी चर्चा का विषय बना हुआ है लोगों का मानना है कि जिस तरह से इस परिवार का सदस्य सपा में शामिल होने के लिए किसी भी क़ीमत पर शामिल होना चाह रहे हैं उससे लगता है कि इस परिवार के एक सदस्य की महत्वाकांक्षा के चलते यह हाल हो गया है कि वह एक या दो सीट पर ही अपनी सियासी मौत के लिए तैयार हो रहे हैं वैसे देखा जाए तो सियासत में कोई हमेशा ज़िन्दा नहीं रहता कोई न कोई असबाब बन जाता है जिसके बाद उसका या उसके परिवार का अंत हो जाता है लगता है इस परिवार की भी उलटीं गिनती शुरू हो गई है बस मोहर लगनी बाक़ी है।सातों सीटों पर दावा करने वाले परिवार को क्या हो गया कि वह एक या दो सीट पर ही तैयार हो गया है।

 

ग़ौरतलब हो कि इस परिवार के सदस्य के सपा में शामिल होने के बाद मोदी की भाजपा को धुर्वीकरण करने में आसानी होगी क्योंकि इस परिवार के सदस्य का विवादों से गहरा नाता रहा है।इसका नुक़सान सपा को भी होगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि जब-जब यह परिवार सपा में रहा तब-तब सपा कमज़ोर हुई और यह परिवार अपना वर्चस्व क़ायम करने में कामयाब रहा यह परिवार जब सपा में नहीं रहे सपा ने अपने दम पर एक या दो सीट पर क़ब्ज़ा किया और इस परिवार के रहते भी एक या दो ही सीटें मिलती रही हैं इससे साफ़ ज़ाहिर है कि सपा परिवार में यह परिवार नहीं रहने से ही फ़ायदा रहा है अब यह बात सपा के मालिक को तय करनी है कि वह सपा को मज़बूत करने की रणनीति पर चलता है या इस परिवार के एहसान से वहीं कामयाबी हासिल करने वाली रणनीति पर काम करता है यह तो आने वाले समय में ही साफ़ हो पाएगा।फिलहाल तो सपा में शामिल होने के लिए गिरकर शामिल हो रहा है इस पर ही चर्चा चल रही हैं।

 

यहाँ यह गौर करने वाली बात है कि सपा का वोटबैंक भी मुसलमान और इस परिवार का वोटबैंक भी मुसलमान क्या पल्स होगा इसका गुणाभाग कोई नहीं कर रहा है या इसको नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।इस परिवार की ख़ास बात यह रही हैं कि इसने अपने फ़ायदे के लिए सियासत की है न कि पार्टी के प्रति वफ़ादारी इनका इतिहास रहा है जहाँ इनको नुक़सान होता दिखाई देता है तो यह मिनटों में अपना बोरिया बिस्तर समेट लेते हैं पार्टी को मँझधार में छोड़ कर वैसे देखा जाए तो सियासत से मुद्दों की सियासत ख़त्म हो गई है नेता इबनुलवक्त हो गए हैं जहाँ देखी तवा परात वहीं गुज़ारी सारी रात यही वजह है कि अब नेताओं की वह क़द्र नहीं रही जैसी पहले हुआ करती थीं।

I think all aspiring and professional writers out there will agree when I say that ‘We are never fully satisfied with our work. We always feel that we can do better and that our best piece is yet to be written’.
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