अखिलेश यादव पर बढ़ रहा भरोसा

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एक दिन पहले ही भाजपा में जान फूंक कर अमित शाह ने योगी को अगला मुख्यमंत्री लगभग घोषित कर दिया। तब लगा कि भाजपा में शामिल होने के लिए लाइन लग जाएगी लेकिन दूसरे ही दिन बसपा के 6 और भाजपा के एक विधायक ने जब समाजवादी पार्टी का दामन थामा तो लगा कि यूपी की राजनीति अभी बहुत गहरी है। इसकी थाह इतनी आसान नहीं है। समाजवादी पार्टी को अखिलेश यादव मुख्य मुकाबले में ले आये हैं। बसपा प्रमुख मायावती भी सत्ता पाने की बेहतर रणनीति बना रही है लेकिन बसपा छोड़कर जिस तरह लोग सपा की साइकिल पर सवार हो रहे हैं, उससे लग रहा है कि लोगों का बसपा पर उतना भरोसा नहीं है, जितना अखिलेश यादव पर है। 

 

 

यूपी विधानसभा चुनाव से पहले कई नेता अपना नफा-नुकसान देखकर पाला बदलने में लगे हैं। नेताओं का एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में शामिल होने का सिलसिला अब तेज हो गया है। मायावती की बसपा को गत 30 अक्टूबर को जोरदार झटका लगा है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में भाजपा के एक और बसपा के 6 विधायक सपा में शामिल हो गए हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसी के तहत सात विधायकों को समाजवादी पार्टी की सदस्यता दिलाई।

 

भाजपा के विधायक का टूटना आश्चर्य जरूर पैदा करता है। राजधानी लखनऊ में सपा के दफ्तर पर भारतीय जनता पार्टी से बगावत करने वाले सीतापुर सदर के विधायक राकेश राठौर के साथ ही बहुजन समाज पार्टी से निष्कासित सात विधायकों ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। बहुजन समाज पार्टी से निष्कासित विधायक सुषमा पटेल, हरगोविंद भार्गव, असलम चैधरी, असलम राइनी, हाकिम लाल बिन्द व मुज्तबा सिद्दीकी समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। समाजवादी पार्टी के मुख्यालय में इन सभी विधायकों ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता लेने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का आभार जताया। सूत्रों के मुताबिक बसपा छोड़ सपा में शामिल होने वाले सभी 6 विधायकों को अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव का टिकट देंगे। मुजतबा सिद्दीकी और हाकिम लाल बिंद प्रयागराज से विधायक हैं। इससे पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक अपने बेटे पंकज मलिक के साथ सपा में शामिल हुए थे। हरेंद्र मलिक प्रियंका गांधी वाड्रा की सलाहकार समिति के सदस्य भी थे। उधर, सपा प्रमुख और पूर्व सीएम अखिलेश यादव बीजेपी पर लगातार हमलावर हैं। अखिलेश ने एक बार फिर बीजेपी पर जोरदार हमला बोला है। अखिलेश ने इसको लेकर तंज कसते हुए बीजेपी को आड़े हाथ लिया है। अखिलेश यादव ने कहा कि बीजेपी यूपी में अपने 403 उम्मीदवार भी घोषित कर दे तो भी जनाक्रोश के डर से उसे ‘चार से तीन’ टिकट मांगने वाले भी नहीं मिलेंगे। अखिलेश ने ट्वीट कर कहा कि बीजेपी चुनाव हारती दिख रही है। बीजेपी से त्रस्त यूपी की जनता बीजेपी को एक-एक वोट के लिए तरसा देगी।

 

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव  में बीजेपी को पटखनी देने के लिए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर की भागीदारी संकल्प मोर्चे  का अस्तित्व अब खतरे में नजर आ रहा है। सुभासपा के 19वें स्थापना दिवस पर मऊ में राजभर द्वारा बुलाई गई महापंचायत में समाजवादी पार्टी से गठबंधन का औपचारिक ऐलान हुआ। इतना ही नहीं अखिलेश यादव विशिष्ठ अतिथि के तौर पर इस महापंचायत में राजभर के साथ मंच पर थे। लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि भागीदारी संकल्प मौर्चा के दो बड़े घटक एआईएमआईएम और प्रगतिशील समाज पार्टी को निमंत्रण नहीं दिया गया। जब राजभर अखिलेश यादव के साथ मंच साझा कर रहे थे, उसी वक्त असदुद्दीन ओवैसी मुजफ्फरनगर तो प्रासपा अध्यक्ष की परिवर्तन यात्रा रामपुर में थे।

 

जानकारों के मुताबिक सुभासपा और समाजवादी पार्टी में गठबंधन के बाद ओवैसी ने भागीदारी संकल्प मोर्चे से किनारा कर लिया है। दरअसल, योगी सरकार से अलग होने के बाद राजभर ने एआईएमआईएम, शिवपाल यादव, भीम आर्मी के चंद्रशेखर के साथ मिलकर भागीदारी संकल्प मोर्चे का गठन किया और इसे 2022 में बीजेपी का विकल्प बताया लेकिन पिछले दिनों अखिलेश यादव से बढ़ी नजदीकियों के बाद राजभर ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन का ऐलान कर दिया। 

 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राजभर और अखिलेश के बीच गठबंधन से पूर्वांचल की दो दर्जन सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं। 2017 में बीजेपी के साथ गठबंधन कर एसबीएसपी ने पूर्वांचल की 8 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 4 में उसे जीत मिली थी। वहीं अन्य चार सीटों पर कड़ा मुकाबला हुआ था। जानकार यह भी मानते हैं कि राजभर वोट बैंक का पूर्वांचल की 100 सीटों पर असर है, जिनमें वाराणसी, ,आजमगढ़, गाजीपुर और मऊ की सीटें शामिल हैं। बसपा के नेताओं के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। अब 20 साल बाद बसपा बीजेपी को टक्कर नहीं दे सकती और न ही कांग्रेस ऐसा करती दिखाई दे रही है। ऐसे में पुराने बसपा नेताओं के पास विकल्प क्या है? मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में काफी फर्क है। मुलायम सिंह की सपा में दलित और अति पिछड़ों को उतना तवज्जो नहीं दिया जाता था लेकिन अखिलेश यादव इससे इतर अन्य जातियों को भी अपने पाले में ला रहे हैं। इसीलिए 2019 के लोकसभा चुनाव में जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी  ने गठबंधन किया तो कहा जा रहा था कि ‘बुआ और बबुआ’ का यह साथ अटूट और अजेय है। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद जमीनी हकीकत कुछ और ही दिखी। 2014 में शून्य पर सिमट चुकी बसपा को 10 सांसद तो मिले लेकिन सपा के खाते में महज पांच सीट ही आई। इसके बाद मायावती ने अखिलेश यादव पर कई आरोप लगाते हुए गठबंधन तोड़ दिया। उस वक्त अखिलेश यादव खामोश रहे और कोई पलटवार नहीं किया। अब जब कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल होने वाले नेताओं का तांता लगा हुआ। जानकार कह रहे हैं अखिलेश यादव की रणनीति कामयाब रही और वे गैर यादव वोटों को सपा के पाले में लाकर बसपा को तगड़ा झटका दे रहे हैं। जिन बसपा नेताओं ने हाल ही में सपा ज्वाइन किया है उनमें घाटमपुर से विधायक आरपी कुशवाहा, पूर्व कैबिनेट मंत्री केके गौतम, सहारनपुर से सांसद कादिर राणा, और बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष आरएस कुशवाहा का नाम शामिल है। इस बीच मौजूदा विधायक लालजी वर्मा और रामअचल राजभर ने भी सपा का दामन थाम लिया। इन दो बड़े नेताओं का सपा में जाना बसपा के लिए बड़ी क्षति के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि लालजी वर्मा को कुर्मी समाज का बड़ा नेता माना जाता है जबकि रामअचल राजभर का अपने समाज में बड़ा कद है। दोनों ही नेता बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं। मायावती का मानना है कि समाजवादी पार्टी में भगदड़ मचने से पहले अपने चेहरे को बचाने की कवायद है। एक के बाद एक ट्वीट कर मायावती ने कहा कि स्वार्थी, टिकट लोभी और दूसरे पार्टियों से निकाले गए नेताओं को सपा में शामिल करने से सपा का वोटबैंक नहीं बढ़ने वाला। मायावती ने कहा कि यह महज खुद को झूठे आरामदायक स्थिति में दिखाने जैसा ही है। जनता सब कुछ जानती है। अगर सपा ऐसे नेताओं को पार्टी में ले रही है तो उनके पार्टी में जो लोग टिकट चाहते हैं वे भी दूसरी पार्टियों में जाएंगे। इससे उन्हें कोई फायदा नहीं होगा बल्कि ज्यादा नुकसान होगा। उधर जानकारों की मानें तो अखिलेश यादव की एक सोची समझी रणनीति है। सपा प्रमुख स्थानीय और समुदाय विशेष के नेताओं के सहारे अपने वोट बैंक को मजबूत करने में जुटे हैं। रणनीति के मुताबिक अखिलेश यादव छोटी जातियों पर भी फोकस कर रहे हैं जिनका विधानसभा में पांच हजार से 40 हजार तक है। अगर ये वोट बैंक सपा के परंपरागत वोट बैंक के साथ जुड़ता है तो उसकी स्थिति काफी मजबूत हो सकती है। 

~अशोक त्रिपाठी

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