राहुल गांधी सिद्धांतवादी और इरादे के पक्के है ये साबित हुआ

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राहुल गांधी आज के सांप्रदायिकता भरे भारत में "गांधी" बनना चाहते हैं

 

अब लगभग यह तय है कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनने नहीं जा रहे हैं।‌ यह खबर राहुल गांधी के चाहने वालों के लिए निराशा जनक तो है ही मगर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि राहुल गांधी अपने फैसले और विचार पर अडिग रहते हैं यह भी सिद्ध किया।राहुल गांधी NSUI के अध्यक्ष रहे , यूवा कांग्रेस के प्रभारी रहे हैं और कांग्रेस के इन‌ दोनोें संगठनों में उनके कार्यकाल को लोकतांत्रिक रूप से एक सफल कार्यकाल कहा जाता है।कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी दिसम्बर 2017 से 3 अगस्त 2019 तक अर्थात लगभग 20 महीने के कार्यकाल को भी आप बहुत हद तक सफल कह सकते हैं।उन्होंने मध्यप्रदेश, राजस्थान , छत्तीसगढ़ का विधान सभा चुनाव बहुमत से जीता और गुजरात में भी भाजपा को पसीने छुड़ा दिए , यदि नरेंद्र मोदी गुजरात जाकर अपने गुजराती होने और गुजराती स्वाभिमान की भावुक दुहाई ना दिए होते तो गुजरात में भी कांग्रेस की जीत ही होती।लोकसभा 2019 का चुनाव नरेंद्र मोदी के 5 साल के कार्यकाल पर नहीं बल्कि पुलवामा और बालाकोट की आड़़ में देश‌ के लोगों की देशभक्ति उभार कर लड़ा गया।

 

 

 

राहुल गांधी ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस पद से इस्तीफा दे दिया, सही या गलत दिया यह बहस का मुद्दा है पर नैतिकता के आधार पर जिस देश में अब इस्तीफे नहीं होते उसमें राहुल गांधी का इस्तीफा एक आदर्श स्थापित करता है।राहुल गांधी आज के सांप्रदायिकता भरे भारत में "गांधी" बनना चाहते हैं, उस दौर में भी कांग्रेस के अध्यक्ष तो तमाम रहे मगर सर्वोच्च वैचारिक नेता "गांधी" जी ही रहे।

 

 

 

भाजपा में भी अटल-आडवाणी के दौर में भाजपा का अध्यक्ष आडवाणी रहें या और कोई सर्वोच्च नेता तो अटल बिहारी वाजपेई ही रहे।आज की भाजपा में ही जेपी नड्डा क्या है ? मोदी और शाह ही सर्वे सर्वा हैं। मगर राहुल गांधी पर आरोप लगाना बहुत आसान है क्योंकि वह सुनते हैं।तो क्या राहुल गांधी , बिना किसी पद के ही कांग्रेस के सर्वे सर्वा रहेंगे ? वैचारिक रूप से पूरी कांग्रेस में राहुल गांधी का कोई‌ विकल्प नहीं , शशी थरूर और अशोक गहलोत भी नहीं‌ और शशी थरूर तो वैसे भी दक्षिण पंथी सोच के है और वैचारिक रूप से अशोक गहलोत भी संदिग्ध ही हैं।मगर अशोक गहलोत की सांगठनिक क्षमता का कोई जोड़ पूरी कांग्रेस में किसी के पास नहीं , राहुल गांधी के पास भी नहीं। यद्यपि वह राजस्थान में सत्ता के स्थानांतरण में गुटबाजी के साथ खड़े हुए तो कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी शुरुआत ही बिगड़ जाएगी।यदि वह अपना कद बढ़ाना चाहते हैं तो उनको सचिन पायलट को सर्वसम्मति से राजस्थान का मुख्यमंत्री बनवा देना चाहिए। देखना दिलचस्प होगा कि अशोक गहलोत राजनैतिक लड़ाई और राहुल गांधी वैचारिक लड़ाई में किस तरह सामंजस्य बनाते हैं।

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