प्रश्न 2024 लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों के गठबंधन का क्या होगा

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फिलहाल की स्थिति देखें तो ममता बनर्जी की टीएमसी और अरविंद केजरीवाल की आप देश की सबसे पुरानी पार्टी को अपने-अपने गढ़ में नुकसान पहुंचाती हुई दिख रही है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दिल्ली और पश्चिम बंगाल में बीजेपी के खिलाफ जीत के बाद टीएमसी और आप उत्साहित हैं। दोनों दल यह जानते हैं कि इस जीत के जरिए वे राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी दमदारी दिखा सकते हैं। हालांकि, यह विस्तार कांग्रेस को नुकसान पहुंचाता दिख रहा है। दोनों पार्टियां टीएमसी और आप कांग्रेस नेताओं को अपने पाले में लाने के लिए लुभा रही हैं। साथ ही वे विपक्ष के तौर पर भी सोनिया गांधी की पार्टी की जगह हासिल करने की कोशिश में है।

 

कांग्रेस पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अपने दम पर सत्ता में है, जबकि, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और झारखंड में गठबंधन में एक छोटे से सदस्य की तरह है। तीन राज्यों के अलावा उत्तराखंड और गोवा जैसे कुछ राज्य भी हैं, जहां कांग्रेस की सीधी जंग बीजेपी से है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इन राज्यों में आप और टीएमसी की रणनीतियां क्या दांव खेलती है। ये दोनों पार्टियां इन राज्यों में भले ही जीत या दूसरे स्थान की दावेदार न हों, लेकिन उनकी नजरें कांग्रेस के जनाधार पर जरूर हैं।

 

त्रिपुरा में 2023 में चुनाव होने हैं, लेकिन टीएमसी ने पहले ही बीजेपी शासित उत्तर-पूर्वी राज्य में अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। कांग्रेस यहां पर 2018 में बीजेपी के हाथों सत्ता गंवाने वाले वाम दल के साथ गठबंधन की कोशिश में है। टीएमसी की तैयारियों ने भी संकेत दिए हैं कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्य दावेदार के तौर पर उतरेगी।

 

 टीएमसी लगातार पार्टी सांसद अभिषेक बनर्जी समेत बड़े नेताओं को त्रिपुरा भेज रही है। विश्लेषक बताते हैं कि राज्य में टीएमसी के तेज होते सियासी सुरों के बीच कांग्रेस नेता सुष्मिता देव का पार्टी छोड़ना उत्तर-पूर्वी राज्यों में ममता बनर्जी की पार्टी के लिए मददगार हो सकता है। देव ने कहा था, 'मैं गांधी परिवार के खिलाफ कुछ नहीं कहने वाली हूं, मुझे उनसे बहुत कुछ मिला है, लेकिन मुझे लगता है कि मैं यहां (टीएमसी) में अपना काम बेहतर तरीके से कर सकती हूं।' देव से पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिषेक मुखर्जी भी कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में शामिल हो गए थे। ऐसा दिख रहा है कि टीएमसी दो स्तरों पर काम कर रही है। पहला, वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि बंगाल चुनाव से पहले बड़ी संख्या में बीजेपी में शामिल हुए नेता पार्टी में लौट आएं। साथ ही 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तैयार हुई टीएमसी, कांग्रेस की विचारधारा के भी करीब है। ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं कि टीएमसी के विस्तार के लिए चेहरों की पहचान करना और शामिल करना पार्टी की प्राथमिकता होगी। इसका एक उदाहरण सुष्मिता देव हैं। जानकार कहते हैं कि उनके आने से पार्टी को त्रिपुरा और असम में बंगाली भाषी मतदाताओं के बीच मदद मिलेगी। उधर, कांग्रेस के नेता कह रहे कि जो जाना चाहता है, उसे जाने दो।

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