समितियों के बिना संसदीय लोकतंत्र अधूरा : राष्ट्रपति

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नई दिल्ली राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसदीय लोकतंत्र में शासन को जवाब देह बनाने में लोक लेखा समिति सहित संसदीय समितियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए शनिवार को कहा कि ‘संसद लोगों की इच्छाओं का प्रतीक है और संसदीय समितियां इसके विस्तार के रूप में कार्य करती हैं।


राष्ट्रपति ने कहा कि संसदीय समितियों में लोक लेखा समिति का रिकॉर्ड दशकों से सराहनीय और उल्लेखनीय रहा है। श्री कोविंद ने संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में लोक लेखा समिति के शताब्दी समारोह का उदघाटन करते हुए कहा कि संसदीय लोकतंत्र में शासन की जवाबदेही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि चूंकि संसद ही कार्यपालिका को धनराशि जुटाने और खर्च करने की अनुमति देती है, इसलिए यह आकलन करना भी इसका कर्तव्य है कि निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार धन जुटाया और खर्च किया गया या नहीं।
संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडु, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और लोक लेखा समिति के सभापति अधीर रंजन चौधरी ने भी संबोधित किया।
उपराष्ट्रपति श्री नायडु ने लोक लेखा समिति का नाम बदलकर लोक लेखा और लेखापरीक्षा समिति रखने का सुझाव दिया।

 


राष्ट्रपति  कोविंद ने कहा कि लोकतंत्र में, संसद लोगों की इच्छाओं का प्रतीक होती है और संसदीय समितियां इसके विस्तार के रूप में काम करते हुए इसे कार्यकुशल बनाती हैं। संसदीय समितियां, विशेष रूप से लोक लेखा समिति, विधायिका के प्रति कार्यपालिका की प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं। इनके बिना संसदीय लोकतंत्र अधूरा रहेगा।


उन्होंने कहा कि देशवासी लोक लेखा समिति के माध्यम से सरकारी वित्त की निगरानी करते हैं।
उन्होंने कहा कि दशकों से लोक लेखा समिति के कामकाज की निष्पक्ष विशेषज्ञों ने भी सराहना की है। यह समिति सरकारी व्यय की जांच न केवल कानूनी और औपचारिक दृष्टिकोण से तकनीकी अनियमितताओं का पता लगाने के लिए करती है, बल्कि अर्थव्यवस्था, विवेक और औचित्य की दृष्टि से भी करती है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि लोक लेखा समिति का शताब्दी समारोह कार्यपालिका को अधिक जवाबदेह बनाने और इस प्रकार जनकल्याण में सुधार करने के तरीकों पर चर्चा के लिए एक आदर्श मंच प्रदान करेगा।


इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति और सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति के साथ मिलकर सरकारी गतिविधियों और इन पर आने वाले व्यय पर स्थायी रूप से निगरानी रखती हैं। उन्होंने कहा कि लोक लेखा समिति पिछले 100 वर्ष के अपने अनुभवों के आधार पर नए परिवर्तन लाए । उन्होंने यह सुझाव दिया कि समिति का नाम बदलकर लोक लेखा और लेखापरीक्षा समिति किया जा सकता है ।


लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि कठिन समस्याओं के बावजूद इन सात दशकों में हम विश्व के सबसे बड़े और सबसे प्रभावी लोकतंत्र के रूप में आगे आए हैं। लोकतान्त्रिक संस्थाओं का मुख्य दायित्व शासन को जनता के प्रति जवाबदेह, जिम्मेदार तथा पारदर्शी बनाना है। संसदीय समितियों ने अपने कार्यों से इसे संभव बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।


केन्द्र और राज्य स्तरों पर लोक लेखा समितियों के बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए  बिरला ने सुझाव दिया कि चूंकि संसद की लोक लेखा समिति और राज्यों की लोक लेखा समितियों के बीच साझे हित के अनेक मुद्दे हैं, इसलिए संसद और राज्य विधानमंडलों की लोक लेखा समितियों का एक साझा मंच होना चाहिए ।


लोक लेखा समिति के सभापति अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि समिति के सदस्य देश के प्रति निष्ठा और सेवा की भावना से दलगत संबद्धताओं से ऊपर उठकर कार्य करते हैं। इस प्रकार यह समिति संयुक्त टीम के रूप में काम करती है और सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की स्वस्थ परंपरा का पालन करती है जिससे समिति की निष्पक्षता का पता चलता है।
इस दौरान श्री कोविंद ने भारत की संसद की लोक लेखा समिति की शताब्दी स्मारिका का विमोचन किया। उन्होंने लोक लेखा समिति की सौ वर्ष की यात्रा को दर्शाने वाली प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया।
इस दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान समिति की कार्यप्रणाली से संबंधित चार एजेंडा विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इनमें प्रथम विषय है- लोक लेखा समिति की कार्यप्रणाली को सुव्यवस्थित करना, गैर-सरकारी स्रोतों से जानकारी एकत्र करना, और कार्यक्रमों/योजनाओं/परियोजनाओं के परिणामों का आकलन करना। दूसरा एजेंडा विषय लोक लेखा समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन और इसके कड़ाई से अनुपालन के लिए तंत्र पर केंद्रित है। तीसरा एजेंडा लोक लेखा समिति को देश के विकास के भागीदार के रूप में विकसित करने के विषय पर है तथा चौथा विषय लोक लेखा समिति का प्रभाव से नागरिकों के लिए उचित प्रतिक्रिया और करदाताओं के धन के सदुपयोग को सुनिश्चित करना है।


उद्घाटन समारोह में केंद्रीय मंत्री, संसद सदस्य, राज्यों के विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारी, राज्यों की लोक लेखा समितियों के सभापति, विदेशी प्रतिनिधि और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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