एनएएफएलडी लीवर की बीमारी से डिमेंशिया का खतरा अधिक

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न्यूयॉर्क जिन लोगों को नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज (एनएएफएलडी) है, उनमें लीवर में फैट सेल्स का निर्माण होता है, उनमें डिमेंशिया का खतरा अधिक होता है। एक नए अध्ययन में ये बताया गया है। एनएएफएलडी लीवर की आम बीमारी है, जो दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत आबादी को प्रभावित करती है। रोग यकृत कोशिकाओं में वसा के संचय से लीवर की सूजन और लीवर सिरोसिस तक बढ़ सकता है।

अत्यधिक शराब का सेवन फैटी लीवर का कारण बन सकता है, वहीं एनएएफएलडी मोटापे और संबंधित स्थितियों जैसे उच्च रक्तचाप या टाइप 2 मधुमेह के कारण भी हो सकता है।

जर्नल न्यूरोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि एनएएफएलडी वाले लोग जिन्हें हृदय रोग भी है या जिन्हें स्ट्रोक हुआ है, उनमें डिमेंशिया का खतरा और भी अधिक हो सकता है।

जिन लोगों को लीवर की बीमारी नहीं है, उनकी तुलना में एनएएफएलडी वाले लोगों में डिमेंशिया की दर 38 प्रतिशत अधिक है।

मस्तिष्क में अपर्याप्त रक्त प्रवाह के कारण होने वाले डिमेंशिया को देखते हुए, शोधकर्ताओं ने पाया कि एनएएफएलडी वाले लोगों में लीवर की बीमारी वाले लोगों की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक दर थी। शोधकर्ताओं ने हालांकि अल्जाइमर रोग नहीं पाया।

लीवर की बीमारी वाले लोग जिन्हें हृदय रोग भी था, उनमें डिमेंशिया का 50 प्रतिशत अधिक जोखिम था। जिन लोगों को लीवर की बीमारी और स्ट्रोक था, उनमें डिमेंशिया का खतरा 2.5 गुना अधिक था।

स्वीडन में करोलिंस्का इंस्टीट्यूट के यिंग शांग ने कहा, "हमारे अध्ययन से पता चलता है कि गैर-मादक वसायुक्त यकृत रोग डिमेंशिया से जुड़ा है, जो मुख्य रूप से मस्तिष्क में किसी प्रकार की चोट से हो सकता है।"

"ये परिणाम इस संभावना को उजागर करते हैं कि लीवर और हृदय रोग एक साथ होने पर इसके उपचार से डिमेंशिया का खतरा कम हो सकता है।"

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