कांग्रेस में तवज्जो न मिलने से जितिन प्रसाद थे खफा

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मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के खेमे में चले गये। राजस्थान में युवा नेता सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से नाराज हैं और कभी भी कांग्रेस का दामन छोड़ सकते हैं। कांग्रेस छोड़कर वे कहां जाएंगे, यह बताने की जरूरत नहीं है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य से एक बड़ा विकेट गिर गया है। ग्रुप-23 अर्थात् सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर बगावती रुख अपनाने वालों में पूर्व सांसद जितिन प्रसाद भी भाजपा में शामिल हो गये। जितिन प्रसाद 9 जून को जब अमित शाह के घर पहुंचे, तभी अटकलें तेज हो गयीं कि जितिन भइया भाजपा में शामिल हो सकते हैं। जितिन प्रसाद को अभी हाल में पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव के समय कांग्रेस का आईएसएफ नेता पीरजादा अब्बास सिद्दीकी से गठबंधन पर आनंद शर्मा का विरोध करना अच्छा नहीं लग रहा था। उन्होंने इसका खुलकर विरोध भी किया था। इस पर भी कांग्रेस में तवज्जो न मिलने से जितिन प्रसाद खफा थे लेकिन सोनिया और राहुल ने इस पर ध्यान नहीं दिया था।


पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये हैं। इस सूचना के बाद ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में हलचल बढ़ गई थी। हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल चुनाव में जितिन राज्य के प्रभारी थे और वहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी। बीते साल ही जितिन प्रसाद ने अपनी अगुवाई में एक ब्राह्मण चेतना परिषद नाम से संगठन स्थापित किया था। इससे पहले साल 2019 में लोकसभा चुनाव के पहले भी प्रसाद के भाजपा में जाने की अफवाह उड़ी थी हालांकि उन्होंने ऐसी किसी संभावना को खारिज कर दिया था। मनमोहन सरकार में मंत्री रहे प्रसाद ने साल 2001 में कांग्रेस जॉइन की थी और पहली बार साल 2004 में संसद पहुंचे थे। माना जा रहा है कि यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा ब्राह्मण चेहरा भाजपा में शामिल करके विशेष संदेश दिया गया है।


मार्च 2019 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले प्रियंका गांधी ने लखनऊ सीट से बीजेपी के दिग्गज राजनाथ सिंह के खिलाफ एक ब्राह्मण प्रत्याशी उतारने पर चर्चा की थी। इस सीट पर प्रियंका की पसंद के प्रत्याशी पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद थे। नफासत भरे और शहरी लुक वाले जितिन प्रसाद के नामांकन पर पूरी गंभीरता के साथ विचार चल रहा था। उद्देश्य यह था कि जीत या हार कुछ भी हो लेकिन ब्राह्मण मतदाताओं के बीच एक मजबूत संदेश जरूर जाएगा। कहा गया कि तब जितिन प्रसाद खुद लखनऊ की बजाए अपनी परंपरागत सीट धौरहरा से चुनाव लड़ना चाहते थे। वहीं पार्टी में उनके विरोधियों का कहना था कि वो दिग्गज राजनाथ सिंह को चुनौती देना नहीं चाहते थे। आखिरकार जितिन प्रसाद ने धौरहरा सीट से ही चुनाव लड़ा और लगातार दूसरी बार उन्हें हार मिली। कांग्रेस को भी राज्य में सिर्फ एक ही सीट पर जीत मिली। खुद राहुल गांधी अपना चुनाव अमेठी से हार गए। कुछ समय बाद कांग्रेस की यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी ने जितिन प्रसाद को अपनी टीम में ले लिया। प्लान ये था कि तीन दशक से राज्य में पार्टी के खोए हुए जनाधार को वापस लाया जाए। तब भी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने इस निर्णय को सही नहीं माना था। हालांकि जब जितिन प्रसाद के खिलाफ उनके संसदीय क्षेत्र में ही विरोध के स्वर उठे थे तो ये सवाल पूछा जा रहा था कि आखिर उन्होंने कांग्रेस की लीडरशिप चेंज करने के लिए लिखे गए खत में हस्ताक्षर क्यों किए? गौरतलब है कि बीते सात साल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी को एक लेटर लिखा था जिसमें संगठनात्मक ढांचे में परिवर्तन की बात कही गई थी।
कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के दौरान अंबिका सोनी ने जितिन प्रसाद के पिता का जिक्र कर पुराने घाव ताजा कर दिए थे। हालांकि खुद सोनिया गांधी की तरफ से कहा जा चुका है कि इस लेटर में कोई भी गलत भावना नहीं थी। लेकिन इसे लेकर स्थानीय नेताओं की तरफ से निशाना साधा जा चुका है। पूरी यूपी कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर राहुल गांधी और सोनिया गांधी के नेतृत्व पर भरोसा जता दिया है। ऐसे में यूपी की राजनीति में जितिन प्रसाद अकेले पड़ गए थे।


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के साथ कांग्रेस के गठबंधन को लेकर जी-23 के नेताओं में फूट दिखाई दे रही थी। विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के बंगाल प्रभारी जितिन प्रसाद ने ट्वीट कर आनंद शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए शीर्ष नेतृत्व के फैसले को पार्टी हित में करार दिया था। दरअसल राज्यसभा में कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने ट्वीट कर कहा कि आईएसएफ और ऐसे अन्य दलों के साथ कांग्रेस का गठबंधन पार्टी की मूल विचारधारा, गांधीवाद और नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है, जो कांग्रेस पार्टी की आत्मा है। इन मुद्दों पर कांग्रेस कार्य समिति में चर्चा होनी चाहिए थी। इसके साथ उन्होंने आगे लिखा, सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस चयनात्मक नहीं हो सकती है। हमें सांप्रदायिकता के हर रूप से लड़ना है। पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की उपस्थिति और समर्थन शर्मनाक है, उन्हें अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। आनंद शर्मा के इन सवालों पर जितिन प्रसाद ने कहा कि गठबंधन करने का फैसला पार्टी और कार्यकर्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। अब समय आ गया है कि सब लोग साथ आएं और चुनावी राज्यों में कांग्रेस के प्रदर्शन को बेहतरीन बनाने की दिशा में मिलकर काम करें। जितिन प्रसाद के इस ट्वीट में पार्टी नेतृत्व का समर्थन तो दिखता है, लेकिन इससे जी-23 में पड़ी दरार भी साफ नजर आती है। प्रसाद उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पूर्णकालिक और सक्रिय लीडरशिप की मांग की थी। साथ ही इन नेताओं ने अपने पत्र में पार्टी में संगठनात्मक चुनाव की भी मांग की थी। 

 

बता दें कि पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा और गुलाम नबी आजाद पार्टी नेतृत्व के खिलाफ काफी मुखर हैं। गुलाम नबी आजाद तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिल खोलकर तारीफ भी कर रहे हैं, जिन पर राहुल गांधी लगातार निशाना साधते हैं। अब जितिन प्रसाद के ट्विटर पर आनंद शर्मा से खुलकर असहमति व्यक्त करने के बाद साफ हो गया है कि जी-23 के नेताओं के विचारों में काफी अंतर है। इसीलिए कोलकाता में लेफ्ट के साथ सीटों के बंटवारे के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए जब अधीर रंजन चैधरी से आईएसएफ के साथ तालमेल पर जवाब मांगा गया तो उन्होंने कहा कि वे कोई भी फैसला व्यक्तिगत रूप से नहीं करते हैं और पार्टी हाईकमान की स्वीकृति लेते हैं। 
~अशोक त्रिपाठी

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