“ ज्यादा संतन से मढ़ी उजाड़ ” यह कहावत तो सभी ने सुनी होगी

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यह कहावत तो सभी ने सुनी होगी कि मढ़ी में ज्यादा संतों के आने से समस्या  पैदा होती है चुनाव के समय राजनीतिक दलों के साथ भी यही हो रहा है। एक सियासी मढ़ी में चंद्रशेखर आजाद रावण को जगह नहीं  मिल पायी है, इसलिए अप्रत्यक्छ रूप में वो भी राम की ही मदद करने में भलाई समझ रहे हैं। बात उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की है। इन चुनावों में राम के सहारे राजनीति के शिखर तक पहुंचने वाली भाजपा के मुकाबले में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने अपने नाराज चाचा शिवपाल यादव समेत छोटे छोटे दलों के तमाम नेताओं को अपने साथ जोड़ लिया है। दलितों के नये उभरे नेता चन्द्र शेखर आजाद रावण अखिलेश यादव से मिलने के लिए लखनऊ में पड़े रहे लेकिन सपा प्रमुख ने उनसे बात ही नहीं की। यह जानकारी स्वयं रावण ने दी थी और निराशापूर्ण शब्दों में कहा था कि लगता है अखिलेश को मेरी जरूरत नहीं है। हालांकि इसके बाद समाजवादी पार्टी की तरफ से भी बयान आया था किस अखिलेश चंद्रशेखर आजाद से भी मिलेंगे लेकिन समाजवादी पार्टी के सामने भी समस्या है। सपा अपने को भिजपा के सबसे सशक्त विकल्प के रूप में प्रस्तुत  कर रही है, इसलिए पचास फीसदी  अर्थात लगभग 202 सीटों पर अपने प्रत्याशी  उतारेगी। इसलिए  रावण की पार्टी  के साथ सीटों का तालमेल, लगता है लटक गया। इस उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ही अखिलेश यादव और चंद्रशेखर आजाद रावण के बीच बात बिगड़ गई है और अब समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी के बीच गठबंधन नहीं होगा। गत 18 जनवरी को खुद भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद ने ऐलान किया कि समाजवादी पार्टी से उनका गठबंधन नहीं हुआ है और उनकी आजाद समाज पार्टी अकेले ही चुनाव लड़ेगी। इस प्रकार चंद्रशेखर आजाद अब अखिलेश यादव के वोट काट सकते हैं, इससे  फायदा भाजपा को होगा। हालाँकि, चंद्रशेखर आजाद ने यह भी कहा है कि उनकी पार्टी समाजवादी पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ेगी, मगर ओपी राजभर, शिवपाल सिंह, स्वामी प्रसाद मौर्य और जयंत चैधरी के खिलाफ पार्टी चुनाव नहीं लड़ेगी। चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि आजाद समाज पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी, मगर ओपी राजभर, शिवपाल सिंह, स्वामी प्रसाद मौर्य और जयंत चैधरी के खिलाफ पार्टी चुनाव नहीं लड़ेगी। उन्होंने 33 सीटों पर उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर कहा कि अखिलेश यादव ने धोखा किया है। जनता तय करे एसी में बैठकर ट्वीट करने वाले नेता चाहिए या सड़क पर लड़ाई लड़ने वाले नेता। उन्होंने कहा कि एक मजबूत विकल्प के लिए चुनाव लड़ेगी आजाद समाज पार्टी। खुद के चुनाव लड़ने के सवाल पर चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि पार्टी तय करेगी तो चुनाव लड़ेंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़ने की तैयारी है, बाकी पार्टी तय करेगी कि वह कहां से चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव के लिए तैयारी पूरी है। आजाद समाज पार्टी का एक-एक कार्यकर्ता चुनावी रण में जाने के लिए तैयार है। इस प्रकार अस्थिरतावादी राजनीति करने का संकेत देने वाले रावण  भाजपा  को कुछ न कुछ लाभ तो दे ही सकते हैं। चंद्रशेखर आजाद ने कहा है कि उनकी पार्टी 33 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी और आगे और सीटों पर विचार किया जा सकता है। इतनी सीटें तो अखिलेश यादव  दे नहीं  सकते थे। चंद्रशेखर ने बताया कि हमारी लिस्ट में 30 फीसदी दलित, 42 फीसदी ओबीसी, 5 फीसदी एसटी कैंडिडेट और बाकी पर अन्य अल्पसंख्यक लोगों को मौका दिया जाएगा। चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि उनकी पार्टी ओपी राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य और जयंत चैधरी के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारेगी। दरअसल, चंद्रशेखर ने जिन सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया है, उनमें सिराथू, नोएडा, मेरठ कैंट, एत्मादपुर, गंगोह, हस्तिनापुर शामिल हैं। इसके अलावा चंद्रशेखर ने गोरखपुर सीट से भी प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है जहां योगी आदित्यनाथ मैदान में हैं।
उधर, भाजपा से मुख्य मुकाबला करने उतर रहे और यूपी की सत्ता में आने का सपना देख रहे सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ओमप्रकाश  राजभर की पार्टी सुभासपा और चाचा शिवपाल सिंह यादव की पार्टी प्रसपा से गठबंधन कर भले ही बड़ा दांव चला है, लेकिन उनका यह दांव टिकट बंटवारे में अब उनपर ही भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। सूत्रों की मानें तो आजमगढ़ में एक सीट प्रसपा और दो सीटों की मांग सुभासपा कर रही है, जबकि इन तीनों सीटों पर सपा के पहले से कई दावेदार हैं। अगर सपा दोनों दलों के नेताओं को टिकट नहीं देती है तो गठबंधन में खींचतान बढ़ेगी और अगर सीटें गठबंधन के खाते में जाती हैं तो सपा को अपने ही नेताओं से भीतरघात का खतरा भी बढ़ जायेगा। पूर्वांचल में आजमगढ़ जिला समाजवादी पार्टी का गढ़ है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने यहां 10 में से नौ सीटें जीती थीं, जबकि एक सीट बसपा के खाते में गई थी। वर्ष 2017 में बीजेपी की लहर होने के बाद भी सपा पांच सीटें जीतने में सफल हुई थी, जबकि बसपा के खाते में चार सीटें गयी थीं। बीजेपी एक सीट जीतने में सफल हुई थी। 


उत्तर प्रदेश में वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। सातवें चरण में आजमगढ़ में चुनाव होना है। बीजेपी निषाद पार्टी से गठबंधन कर मैदान में उतर रही है। अतरौलिया सीट निषाद पार्टी के खाते में बीजेपी ने दे दी है। यहां से बाहुबली अखंड प्रताप सिंह की पत्नी व पूर्व ब्लाक प्रमुख वंदना सिंह का टिकट निषाद पार्टी से लगभग तय माना जा रहा है। ऐसे में अतरौलिया सीट भी सपा की फंसती हुई दिखाई दे रही है। कारण यह है कि इस सीट पर बाहुबली अखंड प्रताप सिंह का सवर्ण मतदाताओं में अच्छा खासा प्रभाव है। यहां करीब 35 हजार निषाद मतदाता हैं, जो पिछले चुनाव में बीजेपी के साथ खड़े हुए थे। अगर यह समीकरण सही बैठा तो वंदना सिंह से मुकाबला करना सपा के लिए मुश्किल होगा। चर्चा है कि सगड़ी सीट अपना दल के खाते में जा सकती है। समाजवादी पार्टी की बात करें तो प्रसपा और सुभासपा से गठबंधन होने के बाद लालगंज और मेंहनगर सुरक्षित विधानसभा सीट पर राजभरों की संख्या 50 हजार से अधिक है। इसलिए ओमप्रकाश राजभर यह दोनों सीटें सपा से अपने खाते में मांग रहे हैं। वर्ष 2017 में बीजेपी ने सुभासपा को मेंहनगर सीट दी थी जबकि मेंहनगर सीट से सपा के वर्तमान विधायक कल्पनाथ पासवान है, वहीं इसी सीट पर बसपा छोड़ सपा में शामिल हुई विद्या चैधरी, पूर्व विधायक बृजलाल सोनकर समेत कई नेता दावेदारी कर रहे है। सुभासपा लालगंज सीट भी सपा से मांग रही है। लालगंज सुरक्षित सीट पर पिछले चुनाव में बसपा को जीत मिली थी। यहां से बसपा के आजाद अरिमर्दन विधायक है। यहां से वर्ष 2017 में सपा से पूर्व विधायक बेचई सरोज उम्मीदवार थे। यहां सवर्णो के साथ राजभर समुदाय की भी संख्या ठीक-ठाक हैं। दोनों सीटों पर टिकट के लिए सुभासपा के मांगने से सपा के दावेदारों में बेचैनी बढ़ गयी है। इसी तरह मुबारकपुर सीट शिवपाल यादव अपने करीबी नेता पूर्व विधायक व पार्टी के महासचिव रामदर्शन यादव के लिए चाहते हैं लेकिन यहां से सपा की तरफ से अखिलेश यादव, चंद्र देव राम यादव करैली और शाहआलम सहित कई दावेदार हैं। इस प्रकार विपक्ष जितना मजबूत दिख रहा है, उतना  वास्तव में नहीं है। यह समस्या सत्तारूढ भाजपा के सामने भी है, जहां दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को समायोजित करने में  समस्या आ रही है लेकिन सपा की राजनीतिक मढ़ी में ऐसे संतों की भरमार हो गयी है।

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