चुनावी महासमर फतह हुआ तो पुष्कर ही फिर मुख्यमंत्री!

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  • चुनावी महासमर फतह हुआ तो पुष्कर ही फिर मुख्यमंत्री!
  • आला कमान कर चुका फैसला 
  • मोदी-शाह-संघ का सशक्त सुरक्षा कवच संग  
  • भाजपा में 60 पार वालों के भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गए हैं युवा सीएम 


चेतन गुरुंग 
देहरादून।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस बार उत्तराखंड के सियासी इतिहास को बदल देते हैं और सरकार में रहने पर किसी पार्टी के विधानसभा चुनाव न जीत पाने के अभिशाप को तोड़ पाते हैं तो फिर सरकार की कमान संभालेंगे, ये तय हो चुका है। पार्टी भीतर के सूत्रों के मुताबिक ये संदेश सभी को है कि सरकार फिर ले आने पर पुष्कर का उत्तराधिकारी कोई नहीं होगा। वह खुद सत्ता की रास थामेंगे। 


बेशक ये सवाल कायम है कि क्या वह इतना तिलिस्म लोगों में पैदा कर पाएंगे कि अगली बार लोग फिर कमल के फूल पर सवार होना पसंद करें ? पार्टी के बड़े नेताओं से बातचीत में साफ होता है कि सीएम को ले के आला कमान और खास तौर पर पीएम नरेंद्र मोदी-गृह मंत्री अमित शाह-पार्टी चीफ जेपी नड्डा और संघ में किसी किस्म का कोई पसोपेश नहीं है। पुष्कर को तब आखिरी पलों में लाया गया, जब पार्टी के हालात उत्तराखंड में बिगड़ते दिख रहे थे। 
पुष्कर पार्टी को फिर से सरकार में किसी भी सूरत में ले लाते हैं तो उनके विकल्प के बारे में सोचना भी आला कमान के लिए शायद गुनाह होगा। बार-बार सीएम बदलने से पार्टी का मज़ाक पहले ही खूब उड़ रहा। सिर्फ 6-7 महीने की सरकार में ही पुष्कर अगर सत्ता को कायम रखते हैं तो ये भाजपा की और खुद उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। काँग्रेस इन दिनों नए प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल की अगुवाई में बहुत आक्रामक और सुधरी दिख रही है। साथ ही कार्यकर्ताओं में भी जोश बढ़ा हुआ नजर आता है। 


हकीकत ये है कि काँग्रेस को सरकार में आने से रोक पाना पुष्कर और बीजेपी के लिए इस बार बेहद चुनौतीपूर्ण रहने वाला दिख रहा है। रेकॉर्ड-इतिहास को आधार बनाया जाए तो अगली बारी सत्ता में आने की काँग्रेस की है लेकिन इस बार बीजेपी के पास सीएम कुछ अलग किस्म का है। वह बाजी पलटने की कुव्वत रखते हैं, ऐसा माना जा रहा है। पुष्कर फैसले लेने और लोगों का विश्वास जीतने के लिए रात-दिन एक कर रहे हैं। फूँक-फूँक के कदम रख रहे। वह मंत्रिमंडल सहयोगियों को शांत रखने की कोशिश भी कर रहे। 


वह संगठन और सरकार के बीच समन्वय मधुर रखने पर ध्यान दे रहे। संघ को पूरी तवज्जो दे रहे। विपक्षी दलों के साथ भी मधुर बर्ताव कर उनको आक्रामक नहीं होने देने की कोशिश कर रहे। पार्टी के किसी को भी कोई सरकारी दायित्व नहीं दिया। इससे एक तरफ कोरोना काल में सरकार खजाने से फालतू बोझ हटा, वहीं वह खतरा खत्म हो गया जो दायित्व पाने की रेस में पीछे छूट जाने वालों की नाराजगी के चलते उत्पन्न होता रहा है। आम लोगों में भी इससे अच्छा संदेश गया। 


इतना जरूर है कि पुष्कर के सरकार का मुखिया बन जाने से बीजेपी के कुछ सूरमाओं के हाथ से तोते उड़ गए हैं। पुष्कर सिर्फ 45 साल के हैं। सीएम बनने की ख़्वाहिश रखने वालों में अधिकांश 60 के पेटे वाले हैं। पुष्कर अगर हाराकिरी न करे तो उनको अब सरकार-2 जैसा नजारा सामने आने पर उत्तराखंड बीजेपी की सियासत के बॉस की कुर्सी से जुदा कर पाना तकरीबन ना-मुमकिन होगा। मतलब ये कि 60 वाले ख़्वाहिश लिए ही पेंशन भी हो सकते हैं। 

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