लोढ़ा से रमना तक: मोदी युग के मुख्य न्यायाधीश

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न्यायिक छल से लेकर अपने खिलाफ मामला खुद सुन लेना


अपने सबसे आवश्यक रूप में, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय भारत के संविधान का संरक्षक है। इस भूमिका में, इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि संविधान के तहत गारंटीशुदा नागरिकों के मौलिक अधिकार राज्य द्वारा कमजोर, नष्ट या अन्यथा प्रभावित नहीं होते हैं। हो सकता है कि इसकी शुरुआत एक निष्क्रिय अदालत के रूप में हुई हो, लेकिन मेरी समझ में दशकों से यह दुनिया भर में अपने समकक्षों के बीच सबसे शक्तिशाली अदालत बन गई है। 
यह श्रेष्ठ स्थिति कम से कम तीन तरीकों से स्पष्ट होती है। सबसे पहले, केशवानंद भारती मामले में अपने निर्णय के माध्यम से न्यायालय ने संवैधानिक संशोधनों पर न्यायिक समीक्षा की शक्ति ग्रहण की। दूसरे, कई निर्णयों के माध्यम से, न्यायिक नियुक्तियों के अधिकार इसने स्वयं लिये और उच्च न्यायालयों को दिये। तीसरा, नागरिकों को अद्वितीय व व्यापक सुरक्षा की गारंटी देकर और जनहित याचिका के माध्यम से अदालतों में जाने का अधिकार सुनिश्चित कर इसने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों को विस्तार दिया है।

 

 


इस अदालत की सर्वोच्च कुर्सी पर भारत के मुख्य न्यायाधीश या सीजेआई बैठते हैं। सीजेआई के कार्यालय के साथ आने वाले कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ देश में किसी भी अन्य भूमिका से अलग हैं। कम से कम, सिद्धांत रूप में, सीजेआई को असामान्य रूप से उच्च स्तर की न्यायिक और प्रशासनिक प्रतिभा का प्रदर्शन करना चाहिए। इस पद की जिम्मेदारियों के एक नमूने में उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति के लिए न्यायाधीशों का चयन करना, सामान्य न्यायिक कर्तव्यों का पालन करने के अलावा, विभिन्न प्रकार के मामलों पर निर्णय लेने के लिए बेंच (खंडपीठ) की संख्या और संरचना तय करना शामिल है। जैसा कि जॉर्ज एच. गडबोइस कहते हैं, मुख्य न्यायाधीश को 'एक सक्षम प्रशासक, पुरुषों और व्यक्तित्वों का एक चतुर न्यायाधीश तथा एक महान व्यक्तित्व' होना चाहिए।

 


लेकिन, परिस्थिति के अनुसार, और कुछ हद तक पसंद से, भारतीय न्यायपालिका भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठता परंपरा का पालन करने के लिए विकसित हुई। नतीजतन, जो व्यक्ति अंततः मुख्य न्यायाधीश बनते हैं, मुमकिन है, उन्हें कुछ गुणों का प्रदर्शन नहीं करने के लिए नियुक्त किया गया हो। वे काम करते हुए इन कौशलों को विकसित करने के लिए मजबूर होते हैं, और कुछ ने ऐसा ईमानदारी से किया है।  उदाहरण के लिए, न्यायमूर्ति सुब्बा राव, न्यायमूर्ति वेंकटचलैया, और न्यायमूर्ति जेएस वर्मा। हालांकि, वरिष्ठता की परंपरा का एक दुर्भाग्यपूर्ण नतीजा यह है कि मुख्य न्यायाधीशों का कार्यकाल बहुत कम होता है। 75 वर्षों में, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में 49 मुख्य न्यायाधीश हो चुके हैं। 1980 के दशक में जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ का कार्यकाल असाधारण रूप से लंबा, सात साल से अधिक का था। दूसरे चरम पर, जस्टिस केएन सिंह केवल 17 दिनों के लिए पद पर रहे। 


तीन अवधि

मुख्य न्यायाधीशों की यह बड़ी संख्या इस पद के विकास और कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका के संबंधों का अध्ययन करने के लिए दिलचस्प डेटा सेट प्रदान करती है। मोटे तौर पर इसे निम्नलिखित हिस्से में बांटा जा सकता है। 1950 से 1971 तक, मुख्य न्यायाधीश के पास न्यायिक नियुक्तियों का पूरा अधिकार था और मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश का हमेशा पालन किया जाता था, वीटो जैसी शक्ति की हद तक भी।

 


1971 से 1993 के बीच, केंद्र में मजबूत एकल दलों की सरकार रही और कार्यपालिका ने ‘कोर्ट पैकिंग’ के एक स्पष्ट प्रयास में, सर्वोच्च न्यायालय में 'प्रतिबद्ध न्यायाधीशों' की नियुक्ति पर जोर दिया। मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका के विशेषाधिकार के साथ कई अधिक्रमण हुए और वरिष्ठता की परंपरा का खुले तौर पर उल्लंघन किया गया। झटका 1981 (एसपी गुप्ता) के पहले न्यायाधीश (फर्स्ट जजेज केस) के मामले में निर्णय था। तब यह माना गया था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय सरकार पर बाध्यकारी नहीं होगी।
1993 में दूसरे न्यायाधीश (सेकेंड जजेज केस) के मामले में और जब न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार संभाला, तो प्रवृत्ति उलट गई और न्यायपालिका ने व्यावहारिक तौर पर नियुक्तियों की शक्ति कार्यपालिका से वापस ले ली। न्यायिक प्रधानता और कॉलेजियम का गठन इसी अवधि में हुआ और तब से कॉलेजियम ने मनमानी और अलोकतांत्रिक होने के लिए काफी कुख्याति हासिल की है, यह आज भी कब्जा जमाए है।

 

 


जब हम भारतीय सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय के विकास की जांच करते हैं, तो यह न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सत्ता के निरंतर स्थानांतरण और पुनरसंतुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। जब कार्यपालिका शक्तिशाली थी, न्यायपालिका ने व्यावहारिक रूप से घुटने टेक दिए और कार्यपालिका का नियंत्रण मान लिया। हालांकि, जब अपेक्षाकृत रूप से गठबंधन की कमजोर सरकारें रहीं तो न्यायपालिका ने अपने लिये शक्तियां बहाल कर लीं।

 

 

 


यह पुनरसंतुलन अब फिर से चल रहा है। 2014 के बाद से, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के तहत कार्यपालिका एक बार फिर एकल पार्टी को बहुमत वाली है। नतीजतन, न्यायपालिका की शक्तियां पहले की तुलना में कमजोर हैं, और लगाम फिर से कार्यपालिका के हाथ में है। हम लोकतांत्रिक संस्थाओं के धीमे विनाश, जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और नागरिकों को उपलब्ध संवैधानिक सुरक्षा में धीरे-धीरे कटौती के माध्यम से कार्यपालिका की निरंकुश प्रवृत्तियां देखते हैं, जिनसे निपटने में कमजोर न्यायपालिका असमर्थ या अनिच्छुक है। 

 


2014 से 2022 तक, मोदी सरकार के आठ साल में आठ व्यक्तियों ने सीजेआई का पद संभाला है। 41वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा से लेकर 48वें न्यायमूर्ति एनवी रमना तक। यह आलेख यह जांचने का प्रयास करता है कि उनके कार्यकाल ने न्यायालय और भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय या पद के विकास में कैसे योगदान दिया है।

 

 


मोदी युग के भारत के मुख्य न्यायाधीश 
2014 में मोदी सरकार के पहली बार सत्ता में आने से ठीक पहले, भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी सदाशिवम थे, जिन्होंने दुर्भाग्य से, पद छोड़ने के लगभग तुरंत बाद केरल के राज्यपाल का पद स्वीकार करने का विकल्प चुना। यह असामान्य और तर्कसंगत रूप से अनियमित नियुक्ति थी जिसमें रिटायरमेंट और नई नियुक्ति के बीच पर्याप्त अंतर भी नहीं था। यह भाजपा सरकार की अपनी ही नीति के खिलाफ था।

 

 

 

अरुण जेटली ने खुले तौर पर घोषणा की थी कि सेवानिवृत्ति पर न्यायाधीशों को नौकरी देने से सरकारों को अदालतों को प्रभावित करने में मदद मिलेगी। इससे भविष्य के न्यायाधीशों के लिए एक खतरनाक मिसाल भी कायम हुई जो आज भी देखी जाती है।
कार्यपालिका द्वारा खड़ी की गई चुनौती के रूप में देखी जा सकने वाली इस कार्रवाई ने न्यायमूर्ति सदाशिवम के उत्तराधिकारी, न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा को अपने स्वयं के साहसिक और अपरंपरागत निर्णय लेने से नहीं रोका। इनमें सबसे प्रमुख है, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बार से बेंच में सीधी नियुक्ति की निष्क्रिय प्रवृत्ति को पुनर्जीवित किया। यह एक ऐसी प्रथा है, जिसे संविधान के तहत अनुमति दी गई थी, लेकिन शायद ही कभी प्रयास किया गया। उनकी सिफारिशें ज्यादातर सफल रहीं, लेकिन एक नहीं होने के लिए मशहूर हुई। गोपाल सुब्रमण्यम की नियुक्ति को सरकार ने अस्वीकार कर दिया था। न्यायपालिका के साथ यह मोदी सरकार का पहला टकराव हो सकता था। न्यायमूर्ति लोढ़ा ने बाद में भी कहा कि वे श्री सुब्रमण्यम की नियुक्ति को आगे बढ़ाने के लिए तैयार थे, लेकिन वकील ने खुद अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली, जिसके कारण टकराव को दरकिनार कर दिया गया। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में सुधारों पर अपनी रिपोर्ट के लिए जस्टिस लोढ़ा एक घरेलू नाम बन गए। विडंबना यह है कि उनकी रिपोर्ट को बाद में उसी न्यायालय ने पूरी तरह से कमजोर कर दिया था जिसने पहली बार में सुधारों की सिफारिश करने के लिए समिति नियुक्त की थी।

 


न्यायमूर्ति एचएल दत्तू, न्यायमूर्ति लोढ़ा के बाद सीजेआई बने। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच पहला बड़ा टकराव इन्हीं के समय हुआ। चौथे न्यायाधीश का मामला (फोर्थ जजेज केस), राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम की वैधता से संबंधित था, जिसे पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा गया था, और गरमा-गरम बहस हुई थी। न्यायपालिका अपनी बात पर अड़ी रही और अंततः विजयी हुई। एनजेएसी अधिनियम (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून) जो निस्संदेह दोषपूर्ण था, को समाप्त कर दिया गया। कॉलेजियम अगर न्यायिक नियुक्ति की एक मनमानी, गुप्त और अलोकतांत्रिक प्रक्रिया है, और इसके परिचालन में  संचार और पारदर्शिता पर्याप्त जरूरी है, लेकिन प्रस्तावित एनजेएसी की योजना जैसे प्रस्तावित की गई थी, उपयुक्त समाधान नहीं था। वैसे तो, सुप्रीम कोर्ट एनजेएसी अधिनियम में खामियों को ठीक कर सकता था, शायद इसकी कमियों को दूर करने के प्रावधानों को पढ़कर, लेकिन उसने ऐसा नहीं करने का चुनाव किया। 

 

 


एनजेएसी के फैसले के बाद भी मामलों का निपटारा नहीं हुआ और उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति के लिए प्रक्रिया का ज्ञापन कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच विवाद का केंद्र बिंदु बन गया। जब जस्टिस टीएस ठाकुर ने सीजेआई का पद संभाला तो तनाव जारी रहा। वे मोदी युग के अंतिम मुख्य न्यायाधीश थे जिन्होंने न्यायिक प्रशासन और नियुक्तियों के मामलों में कुछ रीढ़ दिखाई थी। भारतीय न्यायपालिका की दुर्दशा को मुखर रूप से उजागर करने के अलावा, एक बार तो उन्होंने प्रधान मंत्री की उपस्थिति में आंसू भी बहाये। न्यायमूर्ति ठाकुर ने रिक्तियों को भरने की व्यवस्था पर गंभीरता से काम किया और इस संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला भी लिखा। उन्होंने नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड को चालू किया जो आज न्यायिक प्रणाली के सभी स्तरों को जोड़ता है और वादियों को सूचना का एक साधन मुहैया करता है।
हालांकि, उनके सुधार प्रयासों ने एक विवादास्पद मोड़ ले लिया जब उन्होंने उच्च न्यायालयों में लगभग 20 न्यायाधीशों के स्थानान्तरण का प्रयास किया। इतने बड़े पैमाने पर तबादलों का प्रयास करने वाले वह पहले न्यायाधीश नहीं थे। न्यायमूर्ति वेंकटचलैया और न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने भी यह कोशिश की थी, लेकिन तबादलों के लिए उनकी प्रेरणा हमेशा स्पष्ट नहीं थी, और उनके प्रयोग यकीनन विफल रहे, कई स्थानांतरित न्यायाधीशों को प्रत्यावर्तित किया गया। कानूनी विद्वानों और यहां तक कि पूर्व न्यायाधीशों ने भी खेद व्यक्त किया है कि इस तरह के स्थानांतरण न्यायाधीशों के साथ सिविल सेवकों की तरह व्यवहार करने के समान हैं, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता और समग्र अखंडता के लिए एक गंभीर खतरा हैं। न्यायमूर्ति ठाकुर के कुछ स्थानांतरण आदेश स्पष्ट रूप से खराब थे, और जल्द ही उलट दिए गए थे। 

 

 


दुर्भाग्य से, स्थानान्तरण आज तक जारी है, कई मनमाने और अनुचित हैं तथा किसी दस्तावेजी नीति का पालन नहीं कर रहे हैं। विवादों में अपने कटाक्षों के बावजूद, न्यायमूर्ति ठाकुर सरकार के सामने सही अर्थों में डटे रहने वाले अंतिम मुख्य न्यायाधीश भी थे। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने कार्यपालिका का सामना करते हुए अपना पक्ष रखा था। इसके बाद चीजें पूरी तरह बदल गईं।
सिख समुदाय से भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस जेएस खेहर का आठ महीने से भी कम समय का कार्यकाल था, जिसमें वे निजता के अधिकार और ट्रिपल तलाक निर्णयों सहित कई ऐतिहासिक निर्णयों के पक्षकार थे। जस्टिस खेहर के कार्यकाल ने सुप्रीम कोर्ट में रोस्टर के प्रबंधन में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी पर बहस को भी पुनर्जीवित किया, एक ऐसा मुद्दा जो बाद के कई सीजेआई के कार्यकाल तक चलता रहा। 

 


अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल के सुसाइड नोट में कुछ अप्रमाणित आरोप, जो स्वयं न्यायमूर्ति खेहर सहित कई न्यायाधीशों को संबोधित किया गया था, अदालत के ध्यान में आए। आरोपों की सत्यता पर ध्यान दिए बिना, न्यायमूर्ति खेहर ने जिस प्रक्रिया का पालन किया, वह बिना मिसाल के थी और बिना औचित्य के भी। सुप्रीम कोर्ट ने वीरस्वामी में अपने फैसले में कहा था कि उच्च न्यायपालिका में किसी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही केवल सीजेआई की सलाह से शुरू की जा सकती है। इसके अलावा, अगर सीजेआई के खिलाफ सीधे आरोप लगाए गए हों, तो सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों से अनुमति लेनी पड़ सकती है। श्री पुल की पत्नी ने न्यायमूर्ति खेहर को पत्र लिखकर नोट में उल्लिखित न्यायाधीशों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति मांगी। खुद का नाम होने के बावजूद, सीजेआई ने अपने हिसाब से, हितों के टकराव की सभी चिंताओं की धज्जियां उड़ाते हुए, पत्र को एक रिट याचिका (एक प्रशासनिक प्रश्न को न्यायिक में परिवर्तित करना) के रूप में सूचीबद्ध करने का विकल्प चुना। इससे प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों की पूर्ण अवहेलना का प्रदर्शन हुआ और दूसरों के अनुसरण के लिए एक उदाहरण स्थापित हुआ।

 

 

न्यायमूर्ति खेहर के कार्यकाल के दौरान अन्य विवादास्पद मामला अदालत की अवमानना के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सीएस कर्णन की सजा और बाद में कारावास था। अदालत की अनुशासनात्मक शक्तियों और अवमानना के क्षेत्राधिकार का उपयोग करने की आलोचना के साथ कई लोगों ने निर्णय को असंवैधानिक माना क्योंकि इस कार्रवाई में उच्च न्यायपालिका के एक सदस्य को हटाने के लिए संसद के विशेषाधिकार की भी अनदेखी हुई थी। न्यायिक नियुक्तियों की मूल समस्या को नज़रअंदाज कर दिया गया, साथ ही यह सवाल भी कि कुछ न्यायाधीश पर्याप्त जांच के बिना उच्च न्यायपालिका में कैसे प्रवेश कर सकते हैं।

 

 


अगले सीजेआई न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा थे, जिनके कार्यकाल को उनके चार साथी न्यायाधीशों द्वारा आयोजित अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए याद किया जाता है। इसमें सीजेआई के आंतरिक प्रशासनिक निर्णयों की निंदा की गई थी, विशेष रूप से मामलों के आवंटन में बेंच स्ट्रेंथ और बेंच संरचना के अदालती परंपराओं का पालन नहीं किया जा रहा था और यह कि सीजेआई ने बिना किसी तर्कसंगत आधार के चुनिंदा मामलों को अधिमान्य पीठों को सौंप दिया था। ट्रिगर था, जज बृजगोपाल हरकिशन लोया का मामला, उनकी मृत्यु से जुड़े षड्यंत्र के आरोप और मामले को रोस्टर तथा परंपरा के विपरीत एक निश्चित बेंच को आवंटित करने का निर्णय।

 


मास्टर ऑफ रोस्टर और हितों के टकराव का मामला भी सामने आया। न्यायमूर्ति मिश्रा की अगुआई वाली एक खंडपीठ एक प्रतिबंधित मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पर केंद्रित रिश्वतखोरी से संबंधित सीबीआई के एक संदिग्ध मामले की सुनवाई कर रही थी। इसमें उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को रिश्वत देने के प्रयास के आरोप भी शामिल थे। हितों के टकराव के कारण इस मामले को सीजेआई की बेंच के अलावा किसी अन्य बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने के अनुरोध के साथ, अलग-अलग याचिकाओं ने इस मामले में अदालत-नियंत्रित जांच की मांग की गई थी। नैतिकता और सामान्य समझ की मांग के अनुसार इस मामले से अलग रहने की बजाय न्यायमूर्ति मिश्रा ने स्वयं इन याचिकाओं को सुनने का निर्णय किया, यहां तक कि स्वयं सीजेआई की शक्तियों के दायरे पर भी फैसला सुनाया। अंततः, बहुत सारे अगर-मगर के बाद, याचिकाओं को भारी जुर्माने के साथ खारिज कर दिया गया था, लेकिन न्यायपालिका के भीतर हितों के टकराव के आस-पास की बहस और तेज होती जा रही थी।
वह पहले सीजेआई भी थे जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, हालांकि, अंततः इसे राज्यसभा ने रद्द कर दिया था। इन विवादों के बावजूद, न्यायमूर्ति मिश्रा ने सीजेआई के रूप में अधिकतम संख्या में संवैधानिक पीठों की स्थापना करने में कामयाबी हासिल की और निर्णय व निपटान के बीच संतुलन हासिल करने के लिए लगातार प्रयास किया।

 

 


अगले सीजेआई, जस्टिस रंजन गोगोई का कार्यकाल भी विवादास्पद था। वह पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल रहे थे, और उन्होंने "शोर करने वाले न्यायाधीशों" को सिस्टम पर और सवाल उठाने के लिए प्रोत्साहित किया था। हालांकि, हितों के टकराव की पूर्ण अवहेलना ने उनके कार्यकाल में सबसे प्रमुख मोड़ ले लिया, जब जस्टिस गोगोई सुप्रीम कोर्ट के एक कर्मचारी द्वारा खुद के खिलाफ की गई यौन उत्पीड़न की शिकायत की सुनवाई (हालांकि उन्होंने आदेश पर हस्ताक्षर नहीं किए) में बैठे थे। इस शिकायत से निपटने में नैसर्गिक न्याय के सभी  सिद्धांतों को तोड़ा गया। सीजेआई द्वारा स्वयं आरोपों की जांच के लिए एक समिति गठित करने के अलावा, सीजेआई को दोषमुक्त करने वाली समिति की रिपोर्ट भी शिकायतकर्ता को नहीं बताई गई, आम जनता की तो बात ही छोड़िए। उनकी शिकायत अनुचित बर्खास्तगी और उत्पीड़न के बारे में भी थी, जिसे लगता है कि समिति द्वारा संबोधित नहीं किया गया है। बहुत बाद में, उन्हें अगले सीजेआई बोबडे के अधीन सेवा में बहाल कर दिया गया।

 

 


न्यायमूर्ति गोगोई पर गोपनीयता का जुनून सवार था और नियमित रूप से 'सीलबंद कवर' में अदालत को सूचना प्रस्तुत करने के लिए कहा जाता था (न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने जब इस व्यवहार की निंदा की उसके बाद से इसे बंद कर दिया गया है।) ऐसा असम के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) जैसे मामले में था। इसके बाद राफेल विवाद, चुनावी बांड का मामला आदि में यह जारी रहा। एनआरसी मामले में, जिस तरह से न्यायपालिका ने कार्यपालिका की भूमिका संभाली, लाखों लोगों के नागरिकता के अधिकार को संदेह के घेरे में ला दिया, उसका परिणाम यह हुआ कि टीकाकारों ने इसे 'कार्यकारी अदालत' का उदय करार दिया। अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के मद्देनजर जम्मू और कश्मीर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं के मामले में उनकी कार्रवाई ने एक प्रख्यात वकील को यह कहने के लिए प्रेरित किया कि "गोगोई कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण कानून पर लापरवाह गति से काम किया है।" उनके कार्यकाल में, जो हुआ उसे कुछ कानूनी विद्वान 'न्यायिक छल' कहते हैं, वह भी बढ़ गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों को सुनने से पूरी तरह से बचना चाहा खासकर उन्हें जो देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे। जैसे कि चुनावी बांड का मामला, नागरिकता संशोधन अधिनियम का मामला, अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण आदि, या ऐसे मामलों में वे कोई आदेश दिए बिना मामलों पर बैठे रहे। 

 


न्यायमूर्ति गोगोई ने सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद संसद सदस्य (राज्य सभा) के रूप में एक नियुक्ति को भी स्वीकार कर लिया और न्यायमूर्ति सदाशिवम की सेवानिवृत्ति के बाद की गई उनकी नियुक्ति के समय व्यक्त आशंका फिर से सामने आ गई और न्यायपालिका के मामलों में कार्यपालिका व विधायी हस्तक्षेप में वृद्धि हुई। परेशान करने वाली बात यह है कि लगभग उसी समय, सुप्रीम कोर्ट के जजों में भी चाटुकारिता की प्रवृत्ति शुरू हो गई। जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह ने सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री की प्रशंसा की। न्यायमूर्ति गोगोई की पीठ ने लंबे समय से चले आ रहे अयोध्या विवाद को समाप्त कर दिया, लेकिन सांप्रदायिक विवाद को समाप्त करने का कोई अंत नहीं दिख रहा है। ज्ञानवापी के बाद अब शायद काशी व मथुरा का मामला भी गर्माने वाला है।

 


जस्टिस गोगोई के बाद जस्टिस शरद ए बोबडे सीजेआई के रूप में आए। मोदी युग में उनका कार्यकाल सबसे लंबा था। एक साल और पांच महीने से थोड़ा अधिक। एक तरफ तो इससे न्यायपालिका में प्रौद्योगिकी के साथ साहसपूर्वक प्रयोग करने का अवसर मिला लेकिन न्यायपालिका की ओर से सरकार के प्रति और अधीनता का नेतृत्व इसी समय हुआ। जस्टिस गोगोई के नेतृत्व में शुरू न्यायिक छल की प्रथा उनके कार्यकाल में भी जारी रही। इस अवधि में अदालत ने कुछ मामलों को तरजीह दी, उदाहरण के लिए, पत्रकार सिद्दीक कप्पन बनाम अर्नब गोस्वामी को जमानत मामलों में।

 

 

सीजेआई बोबडे की बेंच ने एक अभूतपूर्व आदेश में, विवादास्पद कृषि कानूनों पर भी रोक लगा दी, और इस मुद्दे की जांच के लिए एक समिति नियुक्त की, जिसमें ऐसे व्यक्ति शामिल थे जिन्होंने पहले से ही सार्वजनिक रूप से कानूनों का समर्थन किया था। न्यायमूर्ति बोबडे को अनुच्छेद 32 के तहत अदालत में याचिका दायर करने के अधिकार पर उनकी मुखर नाखुशी और उच्च न्यायालयों से कोविड मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार छीनने का प्रयास करने के लिए भी याद किया जाएगा। 

 


इन विवादास्पद फैसलों के बावजूद, जस्टिस बोबडे ने न्याय के लिए मामले पड़े रहने की समस्या से निपटने के लिए तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति पर दिशा-निर्देश जारी करके न्यायिक सुधार का प्रयास किया। यह भी उल्लेखनीय है कि उनके कार्यकाल के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में एक भी नियुक्ति नहीं हुई थी। न्यायमूर्ति बोबडे, उच्च न्यायालय के एक सम्मानित वरिष्ठ मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति अकिल कुरैशी की सिफारिश करने के अनिच्छुक थे। संयोग से, उन्होंने सरकार के एक उच्च अधिकारी के खिलाफ आदेश भी जारी किया था। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति नरीमन उनके नाम की सिफारिश करने पर अड़े थे। इससे कॉलेजियम के भीतर गतिरोध पैदा हो गया। यह कॉलेजियम की तथाकथित स्वतंत्रता के बारे में बहुत कुछ बताता है।
इस अवधि में अपना कार्यकाल पूरा करने वाले नवीनतम मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी रमना हैं। जस्टिस रमना आधुनिक युग में सबसे ज्यादा दिखने वाले सुप्रीम कोर्ट के चेहरों में रहे हैं। देश भर में बड़े पैमाने पर भाषण देने और जनता से जुड़ने के अलावा, न्यायमूर्ति रमना ने सर्वोच्च न्यायालय के कुछ पुराने गौरव को भी वापस लाया है। संस्था एक बार फिर ‘सतर्क प्रहरी' लगती है। कुछ जमानत आदेशों और स्टे (जैसे, राजद्रोह), और पेगासस जांच से न्यायपालिका में जनता का विश्वास भी बढ़ा है।

 


यह सब कहने के बाद, उनके कार्यकाल में उनके सहयोगी न्यायाधीशों के कुछ निर्णयों ने नागरिक स्वतंत्रता को गंभीरता से कम करने वाले रहे है। धन शोधन निवारण अधिनियम पर निर्णय, जो गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (वटाली मामला) में न्यायालय के पहले के निर्णय के समान ही था, का प्रभाव लोगों को अनिश्चित काल के लिए लगभग समान रूप से हिरासत में रखने का था, जिसकी तुलना केवल एडीएम जबलपुर मामले से की जा सकती है। 

 


यह ध्यान देने वाली बात है कि न्यायमूर्ति रमना ने सर्वोच्च न्यायालय में सभी पदों को भर दिया और उच्च न्यायपालिका में काफी बड़ी संख्या में नियुक्तियां कीं। इनमें कई महिला जजों की नियुक्ति शामिल है। यह व्यवस्था को विविधता देने के लिए उठाए गए प्रत्यक्ष कदम में से एक रहा। दुर्भाग्य से, न्यायिक छल की प्रथा न्यायमूर्ति रमना के कार्यकाल में जारी रही, और ना किसी संवैधानिक पीठ का गठन किया गया, और न ही महत्वपूर्ण मामलों को उठाया गया। 


भविष्य


आज भारत के 49वें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति यूयू ललित सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। इनका कार्यकाल तीन महीने से कम का होगा। हालांकि, उनके कार्यकाल के बारे में कोई ठोस टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, लेकिन जितने कम समय वे पद पर रहे हैं उसी में न्यायमूर्ति ललित ने दिखा दिया है कि मामलों को दाखिल करने और सूचीबद्ध करने की प्रक्रियाओं में सुधार के माध्यम से रजिस्ट्री में सुधार किया जा सकता है। उन्होंने बेंच (खंडपीठ) के गठन में भी पहल की है और जो कुछ यादगार शुरुआती आदेश दिए हैं। उदाहरण के लिए, कप्पन और सीतलवाड़ मामलों में, ऐसे व्यक्तियों को जमानत दी गई है जहां मूल अभियोग ही आधारहीन था। ये सभी घटनाक्रम न्यायपालिका के लिए वायदे की तरह हैं और उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय संविधान के सच्चे संरक्षक और मौलिक अधिकारों के रक्षक होने के अपने कार्यों पर खरा उतरेगा, जो एक समय इसका मतलब होता था।

 


आने वाले दशकों में, सुप्रीम कोर्ट को कई मोर्चों, विशेषकर कार्यपालिका से चुनौतियों का सामना करना पड़ता रहेगा। इसमें भारतीय न्यायपालिका, विशेषकर निचली अदालतों को मजबूत करने की नई जिम्मेदारियां भी होंगी, जो हाल के दिनों में कई मामलों में लड़खड़ाती दिख रही हैं। एक गतिशील और विचारशील नेतृत्व, नीचे के न्यायाधीशों द्वारा समर्थित, यह सुनिश्चित करने में सक्षम होना चाहिए कि इन चुनौतियों और जिम्मेदारियों को उचित रूप से पूरा किया जाए। भारत का सर्वोच्च न्यायालय, साथ ही सीजेआई का कार्यालय भी विकसित होता रहेगा, लेकिन उम्मीद है, वे सही दिशा में ऐसा करेंगे।

 

 ~ न्यायमूर्ति एपी शाह
( दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष रहे हैं

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