आगामी विधान सभा इलेक्शन में किसान आंदोलन का पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पड़ने वाला असर

ShahTimesNews
Image Credit: ShahTimesNews

विधान सभा इलेक्शन में अभी तकरीबन आठ महीनो का समय बाकि हैं किन्तु अभी से सभी राजनैतिक दलो में हलचल देखी जा सकती हैं। जहा भारतीय जनता पार्टी अपनी आंतरिक यूनिट को मज़बूत करने के साथ बहार के छोटे दलो से गुणा भाग करने में केंद्रित हैं, वही दूसरी और अन्य दलो ने भी कमर कस ली हैं। 

राजनीतिक विष्लेशक सैय्यद रिज़वान ज़ैदी का कहना हैं " सरकार को चाहिए इस आंदोलन का हल निकाल इसे खत्म करे,वरना इसका असर आगामी विधानसभा में दिखेगा। पश्चिमी यूपी में करीब 20 सीटों पर जाट समुदाय हार-जीत तय करते हैं। करीब 17 लोकसभा क्षेत्र पश्चिम में हैं, ऐसे में इस वोट को सहेजना भी बड़ी जिम्मेंदारी है। हालांकि, बीजेपी जाट वोटों को किसी भी कीमत पर खिसकने नहीं देना चाहती है। इस मुश्किल से निपटने के लिए उसने अपने नेताओं को लगाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े नेताओं से कहा गया है कि इस कानून को लेकर भ्रम दूर करने की कोशिश करें। प्रदेश सरकार के मंत्री भी संवाद के माध्यम से किसानों को समझाने का प्रयास करेंगे।" 

आगे ज़ैदी कहते हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति किसानों के इर्द-गिर्द घूमती है। किसानों का रुख जिस पार्टी की ओर होता है सत्ता की चाबी उसी के पास होती है। नए कृषि कानून बनने से किसान तबका भाजपा से नाराज है। इसके परिणामस्वरूप आंदोलनों और धरने की बाढ़ सी आ गई। विपक्षी दल भी आंदोलन में कूद पड़े। कई खाप किसानों के समर्थन में खड़ी हो गईं। इससे भाजपा नेतृत्व की बेचैनी बढ़ गई। पार्टी ने जनप्रतिनिधियों को किसानों के बीच जाकर कृषि कानूनों के फायदे समझाने और भाजपा के प्रति गुस्सा कम करने की जिम्मेदारी सौंपी है। जनप्रतिनिधियों को भी कई जगह किसानों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। 

ज़ैदी ने कहा,पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की परेशानी बढ़ सकती है, इस क्षेत्र में किसान आंदोलन का असर नजर आ सकता है।वैसे तो पूरे प्रदेश में जाटों की आबादी 6 से 8 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन पश्चिमी यूपी की बात करें तो यहां जाट 17 फीसद से अधिक हैं। 

खासतौर से सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, नगीना, फतेहपुर सीकरी और फिरोजाबाद में जाटों अच्छी खासी जनसंख्या देखने को मिलती है।इन जिलों में गुर्जरों की संख्या भी ज्यादा ही देखने को मिलती है, लेकिन जाट थोड़े ज्यादा हैं। ऐसे में आगामी यूपी विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर सभी दलों ने जाट वोटों को लेकर सक्रियता बढ़ा दी है। लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव, जाट मतदाता जिसपर मेहरबान हो गये उसकी जीत का रास्ता खुल जाता हैं। 

2017 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव और 2019 का लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो यह बात सच होती नजर आती हैं। इससे भी पहले वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जाटों ने अपना जनादेश कुछ इस तरह दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी लोकसभा सीटें भाजपा के खाते में गई। यह सिलसिला 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा। इस क्षेत्र में भाजपा की एकतरफा जीत होती दिखी और सपा-बसपा और रालोद का मजबूत गठबंधन भी साँसे भरता नज़र आया।î


Shah Times is a Daily Newspaper & Website brings the Latest News & Breaking News Headlines from India & around the World. Read Latest News Today on Sports, Business, Health & Fitness, Bollywood & Entertainment, Blogs & Opinions from leading columnists.
View all posts

Leave a Reply