डॉक्टर देवता हैं लेकिन लूट-खसोट में रेकॉर्ड भी तोड़ रहे अस्पताल!

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डॉक्टर देवता हैं लेकिन लूट-खसोट में रेकॉर्ड भी तोड़ रहे अस्पताल!
न कानून का डर न मानवता का ख्यालः अकेले कोटिया अस्पतालों को सिखा रहे सबक 
अरिहंत-कालिंदी-मैक्स के आगे सरकार की घिग्घीः किसी पर कोई कार्रवाई नहीं 



देहरादून उत्तराखण्ड में कोरोना और ब्लैक फंगस महामारी के दौर में बेनकाब हुए अस्पतालों के सामने सरकार शीर्षासन करती दिख रही। अरिहंत-कालिंदी अस्पताल मरीजों से मनमाने ढंग से फीस वसूलने में धरे गए लेकिन सरकार इन पर चाबुक चलाने की हैसियत में ही नहीं दिख रही। मैक्स सरीखा कथित दिग्गज अस्पताल तो मृत मरीजों के सामान की चोरी के मामलों में लगातार कालिख का सामना कर रहा। सवाल ये उठ रहा है कि आखिर तीरथ सरकार के सामने ऐसी क्या मजबूरी है कि वह ऐसे अस्पतालों के खिलाफ बेबस नजर आ रही ? क्यों ऐसा लग रहा कि अंदरखाने वह इन अस्पतालों के साथ खड़ी है। जो जितना लूट सके उतना लूट लो के सिद्धान्त पर चलते दिख रहे हैं। अरिहंत के खिलाफ सरकार ने सिर्फ चलताऊ किस्म का नोटिस दे के जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। आज तक इंतजार है कि देहरादून के शास्त्रीनगर में स्थित इस अस्पताल पर सरकार आखिर क्या कार्रवाई करती है। 


मुकदमा दर्ज होने की उम्मीद तो अब कोई नहीं कर रहा। जो अस्पताल आयुष्मान कार्ड धारकों से कैश पैसा ले के ही ईलाज करने को राजी हो। जो सरकार के अफसरों के फोन तक जान बूझ के न उठाए ( ये खुद सरकार ने माना है ) , जो एसजीएचएस से आच्छादित कर्मचारियों को कैश लेस ईलाज न दे रहा हो। कोविड की गाइड लाइन का पालन न कर रहा हो, उसको कैसे सरकार बख्श सकती है, ये सवाल पूछा जा रहा है। सवाल उठ रहे कि सरकार का रुख ऐसा रहा तो बाकी इस किस्म की करतूतों को अंजाम देने वाले निजी अस्पतालों का हौसला आखिर कैसे नहीं बढ़ेगा ?


माना जा रहा है कि सत्तारूढ़ पार्टी के कई लोग इस अस्पताल को बचाने की कोशिशों में जुटे हैं। इसके चलते सरकार इसका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही। कालिंदी अस्पताल तो और गजब का निकला। विकासनगर का ये अस्पताल तब सुर्खियों में आया जब इसने एक ही दिन में 29 कोविड मौतें अपने यहां दिखा दीं। ये मौतें अलग-अलग दिन की थीं। जो दबा के रखी गई थीं। दबाव पड़ा तो सभी को एक साथ  दिखाना पड़ा। तब उसकी इस हरकत का पर्दाफाश हुआ। फिर तो बाबा बर्फानी ( हरिद्वार) और कई अन्य अस्पताल इस किस्म के मामलों में घिरे। कैश लेस ईलाज न करने का आरोप भी कालिंदी पर चिपका है। 


एक पूर्व विधायक की भी हिस्सेदारी इस अस्पताल में बताई जा रही है। इसके खिलाफ भी सरकार हाथ पर हाथ धर के बैठ गई लगता है। मैक्स अस्पताल तो और भी आगे निकल गया। वहां लगातार कोरोना मरीजों की मृत्यु के बाद उनके मोबाइल चोरी होने के शर्मनाक आरोप ही नहीं लगे। ये भी आरोप चिपके हैं कि वह मरीजों की मौत के बाद उनकी बची बिना इस्तेमाल हुई दवाइयां खुद रख लेता है। उनको फिर से अन्य मरीजों को मोटी कीमत पर बेच देता है। भले अस्पताल प्रबंधन अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए इससे इन्कार करे। आज फिर मृत कोरोना मरीज के मोबाइल चोरी का मामला मैक्स में सामने आया है।  


इसमें शक नहीं कि एलोपैथिक चिकित्सा के खिलाफ रामदेव के बकवास बयानों पर दुनिया के 90 फीसदी लोग डॉक्टरों के साथ हैं, लेकिन कुछ अस्पतालों के इस रुख के चलते लोग भगवान माने जा रहे ज्यादातर एलोपैथिक डॉक्टरों और अस्पतालों पर भी अंगुली उठाने से नहीं चूक रहे। भले ऐसा नहीं है। कई डॉक्टर-अस्पताल बहुत अच्छी तरह फर्ज निभा रहे हैं। राज्य स्वस्थ्य प्राधिकरण के अध्यक्ष दिलीप कोटिया ने ऐसे लुटेरे अस्पतालों के खिलाफ मुहिम अकेले छेड़ के कई मरीजों के पैसे इन अस्पतालों से वापिस दिलाए। देहरादून के डीएम ने भी सभी अस्पतालों को अल्टिमेटम दे दिया है। 


सवाल फिर ये है कि सरकार क्यों अस्पतालों की गैर कानूनी-अनैतिक हरकतों पर खामोश है ? आज कल कोरोना कुछ कम हुआ है लेकिन कुछ ही दिन पहले तक अस्पतालों से लाशों की बारात सी निकल रही थी। वे श्मशान घाट-कब्रिस्तान तक लगातार पहुँच रही थी। दाह संस्कार-दफन के साथ ही ये दास्तान खत्म हो रही थी। तमाम अस्पतालों ने ऐसे मौके को शर्मनाक ढंग से अपने लिए सिर्फ दिवाली-ईद की तरह लिया। लाखों की फीस ऐंठीं। भले मरीज जिंदा आया। लाश बन के गया। मानवता की सेवा की शपथ भुला बैठे थे। 

~चेतन गुरुंग 

I think all aspiring and professional writers out there will agree when I say that ‘We are never fully satisfied with our work. We always feel that we can do better and that our best piece is yet to be written’.
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