कांग्रेस को शरद पवार की नेक सलाह

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सलाह-मशविरा शब्दों के ही मोहताज नहीं होते। राजनीति में भी इशारों, इशारों में इस तरह की सलाह दी जाती है। यह बात दीगर है कि जिसको सलाह दी जा रही है, उसकी समझ में कितना आता है। कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता रह चुके राष्ट्रवादी कांगेस पार्टी (एनसीपी) के नेता शरद पवार ने पिछले दिनों कोंग्रेस को ऐसी ही सलाह दी है। शरद पवार ने कांग्रेस को पुराने जमींदार बताया है। कांग्रेस के लिए यह आईना है। शरद पवार अब तक हर मोर्चे पर यही कहते रहे कि विपक्षी एकता कांग्रेस के बगैर अधूरी रहेगी अर्थात् विपक्ष का नेता वे कांग्रेस को ही मानते हैं लेकिन कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व यह समझने को तैयार ही नहीं हैं। शरद पवार का इशारा पश्चिम बंगाल मंे तीसरी बार सरकार बनाने वाली तृणमूल कांग्रेस और दिल्ली में भाजपा को धूल चटाने वाली आम आदमी पार्टी की तरफ है। ये दोनों पार्टियां अब अपने को मुख्य विपक्षी दल बनाने का प्रयास कर रही हैं लेकिन कांग्रेस पुराने जमींदार की तरह निरर्थक मूंछें ऐंठ रही है। इसका एक उदाहरण तो कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला और राहुल गांधी के बयान हैं। सुरजेवाला ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि जो छोड़कर जा रहे हैं, उन लोगों के लिए बेहतर की कामना करते हैं। राहुल गांधी ने कहा था कि जाना चाहते हैं, उन्हें जाने दो, हमे उनकी जरूरत नहीं है।

 

पिछले दिनों राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने कांग्रेस की तुलना सब कुछ गवां चुके एक जमींदार से कर विपक्षी एकता में दरार को उजागर कर दिया है। इस बयान से साफ है कि विपक्षी एकता के लिए सिर्फ भाजपा विरोध काफी नहीं है। विपक्ष के अंदर भी नेतृत्व को लेकर झगड़ा है और क्षेत्रीय छत्रप अपनी दावेदारी जता रहे हैं।शरद पवार ने कांग्रेस की तुलना जमींदार से यूं ही नहीं की है। इसके जरिए उन्होंने साफ कर दिया कि विपक्षी एकता में कांग्रेस को अपनी भूमिका समझनी होगी। पवार के इस बयान से कांग्रेस के असंतुष्ट नेता सहमत हैं। उनकी दलील है कि पिछले छह साल में हम आगे बढ़ने के बजाए पीछे गए हैं। यह एक हकीकत है। पवार का यह बयान विपक्षी दलों के बीच अविश्वास को भी प्रकट करता है। विपक्षी दलों को खुद पर जितना भरोसा है, उतना भरोसा उन्हें कांग्रेस पर नहीं है। क्योंकि, पिछले दो लोकसभा चुनाव में पार्टी खुद को साबित करने में विफल रही है। इसलिए, विपक्षी दल कांग्रेस को नेतृत्व के बजाए सहयोगी पार्टी के तौर पर देख रहे हैं।

कांग्रेस को जमींदार बताकर तंज कसने के पवार के बयान को उनकी महत्वाकांक्षा से जोड़कर भी देखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद शरद पवार ने जून में विपक्ष को एक मंच पर लाने के लिए विभिन्न दलों की बैठक बुलाई थी। दिलचस्प बात यह थी इस बैठक में कांग्रेस के किसी नेता को आमंत्रित नहीं किया गया था। यह संकेत हैं कि शरद पवार एक महत्वकांक्षी नेता हैं। उनकी कोशिश होगी कि पूरा विपक्ष उन्हें अपना नेता स्वीकार करे क्योंकि, जैसे ही पवार या ममता को एकजुट विपक्ष का नेता स्वीकार करते हैं, तो कांग्रेस सहयोगी दल की भूमिका में आ जाएगी। इससे भविष्य के लिए भी क्षेत्रीय छत्रपों के लिए रास्ते खुल जाएंगे। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का यह बयान महाराष्ट्र की सियासत से भी जोड़कर देखा जा सकता है। शिवसेना कई बार पवार को यूपीए का अध्यक्ष बनाने की मांग कर चुकी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले लगातार जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी नजर उस वोट बैंक पर है, जो कांग्रेस से छिटककर एनसीपी के पास चला गया है। यह भी शरद पवार को नागवार गुजर सकता है। नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के एफिडेविट के विश्लेषण के अनुसार, कांग्रेस ने 2014 और 2021 के बीच चुनाव में सबसे ज्यादा उम्मीदवार गंवाए हैं। कांग्रेस के 222 उम्मीदवारों ने पार्टी का साथ छोड़ा। वहीं, 177 सांसद और विधायक भी 7 सालों में पार्टी को अलविदा कह गए। कुल 399 सांसदों और चुनावी उम्मीदवारों ने पार्टी छोड़ी है। इस दौरान 115 उम्मीदवारों और 61 सांसद, विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टी का दामन थामा। तुलना की जाए, तो 2014 से लेकर अब तक बीजेपी के 111 उम्मीदवार और 33 सांसदों ने पार्टी छोड़ी लेकिन कांग्रेस के विपरीत बीजेपी ने गंवाने से ज्यादा हासिल किया। इस दौरान 253 उम्मीदवार और 173 सांसद, विधायक पार्टी में शामिल हुए। अब जब आप और टीएमसी ने आक्रामक रुख अपनाया है, तो आंकड़ों के लिहाज से कांग्रेस की स्थिति और बिगड़ सकती है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2024 के चुनावों से पहले अपने सदस्यों को साथ रखने की होगी। 

~अशोक त्रिपाठी

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