सीएम पुष्कर यूनिट टेस्ट में अव्वल, सालाना टेस्ट में टॉप करने की चुनौती 

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  • सीएम पुष्कर यूनिट टेस्ट में अव्वल, सालाना टेस्ट में टॉप करने की चुनौती 
  • मंत्रियों को साधा,नौकरशाहों पर नकेल डाली
  • योजनाओं के सहारे अवाम का दिल जीतने की कोशिश 
  • आला कमान को पहले महीने सुकून की सांस लेने का दिया मौका 


चेतन गुरुंग 
देहरादून।
फौजी पुत्र युवा पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री के तौर पर पहला महीना ढ़ोल-नगाड़े की आसमानी गूंज के साथ पूरा कर छाप छोड़ने में सफल रहे। उन्होंने आला कमान को राहत-सुकून की सांस लेने का मौका भी दिया। सियासी विश्लेषक-मीडिया मान रही कि यूनिट टेस्ट को 
मुख्यमंत्री ने वाकई बहुत अच्छे नंबरों से पास कर लिया है पर असल चुनौती आम चुनाव के तौर पर सामने है। जो 5 महीने बाद है। इसमें टॉप किए बगैर गुजारा नहीं होगा। उत्तराखंड का सियासी इतिहास बताता है कि यहाँ के लोग किसी भी पार्टी को लगातार दो बार सरकार बनाने से रोकने की आदत पाले हुए हैं। 


पुष्कर को मोदी की शीर्ष और इकलौती पसंद के तौर पर पहचाना जाता है। तमाम सीनियर और दिग्गजों को कहीं पीछे छोड़ कर वह इसी लिए निजाम के मुखिया बनाए गए। जरा उन नामों को देखिए जो सीएम बनने के लिए क्या-क्या नहीं कर रहे थे-सतपाल महाराज, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, अजय भट्ट और डॉ. धन सिंह रावत उन नामों में शुमार हैं जो न सिर्फ मुख्यमंत्री बनने की लालसा रखते हैं बल्कि जब भी मौका मिला, अंदरखाने जम के ज़ोर लगाते रहने से नहीं चूके हैं। पुष्कर खामोशी से आए और मानसूनी मेघों की तरह छा गए। किसी को कानों-कान भनक तक नहीं लगी। 
उनका सीएम बनना तकरीबन वैसा ही है जैसे ओलिम्पिक की 100 मीटर फर्राटा दौड़ कोई 10 मीटर के फासले से दूसरे नंबर के खिलाड़ी को पीछे छोड़ के जीत ले। पुष्कर का चयन कोई अंतिम क्षणों तक पसोपेश वाला मामला नहीं था। विकिपीडिया में पुष्कर को ऐलान से घंटों पहले उत्तराखंड का सीएम लिखा जा चुका था। ये भी पुष्कर की खासियत है कि वह उत्साह के अतिरेक में बह नहीं जाते हैं। उत्तराखंड राज्य के गठन के दौरान भगत सिंह कोश्यारी (मौजूदा राज्यपाल-महाराष्ट्र और तब के ऊर्जा मंत्री) के पीआरओ फिर ओएसडी (जब कोश्यारी सीएम बने) से होते हुए भाजपा युवा मोर्चा के दो बार प्रदेश अध्यक्ष, दो बार विधायक होते हुए पुष्कर मौजूदा सर्व शक्तिशाली हैसियत तक पहुंचे हैं। 
जब उनको त्रिवेन्द्र और फिर तीरथ मंत्रिपरिषद में मौका नहीं मिला तो सभी ये मान चुके थे कि पुष्कर की रेलगाड़ी अब मंत्री बनने के मामले में छूट गई है। किसको पता था कि उनको इतिहास रचना है। सीधे सीएम बनना है। उनके सामने चुनौतियाँ बेशुमार हैं। विकास योजनाएँ पटरी पर लानी हैं। सरकारी नौकरियाँ युवाओं को देनी हैं। स्वरोजगार को बढ़ाना है। लोगों का विश्वास इस कदर जीतना है कि उत्तराखंड सियासत का इतिहास बदल जाए। नौकरशाही को लगातार कसे रखना है। नौकरशाही में काफी हद तक पुष्कर ने लगाम लगाई है। सिवाय कुछ नामों को छोड़ के। जो अभी भी अंदरखाने चर्चा पा रहे। 


सुनने में आ रहा कि बचे-खुचे विवादितों पर भी उनका वार कभी भी हो सकता है। इसके साथ ही पुष्कर के लिए मंत्रिमंडल में शामिल दिग्गजों सतपाल महाराज-बंशीधर भगत-बिशन सिंह चुफाल-हरक सिंह रावत-यशपाल आर्य को काबू में रखना कभी आसान नहीं हो सकता था। मंत्रियों के मंत्रालयों के बँटवारे में कई मुंह फुला गए कि उनको नजर अंदाज किया गया। काँग्रेस पृष्ठ भूमि वालों को तवज्जो दी गई। भाजपा के पुराने खुर्राण्ट होने के बावजूद उनको महकमे हल्के दिए गए। ये हालात इधर कुआं-उधर खाई वाली थी। 


पुष्कर ने प्रेम से तकरीबन कानों में सरगोशी वाले अंदाज में भाजपा पृष्ठ भूमि वालों को फुसफुसाते हुए लेकिन सख्ती से समझाया-आपको सीधे मोदी जी-अमित भाई (शाह) से बात करनी होगी। अगर कुछ बदलाव करना चाहते हो, महकमों में। किसकी मजाल जो इन दो नामों से महकमों को ले के बात करे। मामला ठंडा पड़ गया। पुष्कर उनको ये कहते हुए सम्मान देते जरूर दिखे कि आप सिर्फ मंत्री नहीं हैं। मेरे-राज्य तथा सरकार के अभिभावक भी हैं। आपको मेरे और सरकार के मार्गदर्शन में भी रहना है। प्रशासनिक तौर पर अनुभवहीन होने के बावजूद पुष्कर सरकार चलाने में परिपक्व दिखे हैं। न किसी नौकरशाह को हावी होने दे रहे, न ही किसी की प्रतिभा को दबाया जा रहा। 


राजनीतिक नियुक्तियाँ (मसलन दायित्व) भी करने से वह बचते दिख रहे हैं। शायद चुनाव तक अब ये नियुक्तियाँ न ही हो। आगे अभी 5-6 महीने पुष्कर के पास और है। अपना हुनर और काबिलियत दिखाने के लिए। इसमें वह कामयाब रहते हैं तो उत्तराखंड सियासत का इतिहास नए सिरे से लिखा भी जा सकता है। इतिहास लिखने के लिए उनको अभी और मेहनत करनी होगी। ये ध्यान में रखते हुए कि जिंदगी में नामुमकिन कुछ भी नहीं। 

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