चौधरी अजीत सिंह : आई आई टी इंजीनियर से कद्दावर जाट नेता तक का सफर

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चौधरी अजीत सिंह, एक ऐसा नाम जो किसी पहचान का मोहताज नहीं रहा,चौधरी साहब हिन्दू - मुस्लिम एकता का चेहरा और किसानो के मसीहा रहे हैं। चौधरी साहब का जन्म 12 फरवरी 1939 को मेरठ के भडोला गाँव मैं हुआ , वे पूर्व प्रधानमंत्री और देश के बड़े किसान नेता चौधरी चरण सिंह के बेटे थे। चौधरी साहब लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएससी करने के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए आईआईटी खड़गपुर चले गए। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के इलिनाइस इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से मास्टर ऑफ साइंस कि डिग्री प्राप्त की।  चौधरी साहब ने करीब 15 साल तक अमेरिका में रहकर  ही नौकरी की। वह पेशे से कम्प्यूटर इंजीनियर थे और 1960 के दशक में आईबीएम के साथ काम करने वाले पहले भारतीयों में से एक थे। 


 
जब बड़े चौधरी साहब की तबियत नासाज़ रहने लगी तो छोटे चौधरी ने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने की लिए अमेरिका से नौकरी छोड़ दी और जाट राजनीति मैं कदम रख दिए।   
चौधरी अजीत सिंह पहली बार 1986 में राज्यसभा के लिए चुने गए । वे क्रमशः 1987 और 1988 के दौरान जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। 1989 में, वे जनता दल के महासचिव थे, जब वीपी सिंह के नेतृत्व में  दलो ने विलय का फैसला लिया तो उस चुनाव के दौरान अजीत सिंह उत्तर प्रदेश से वीपी सिंह के लिए सबसे अधिक राजनीतिक ताकत जुटायी। अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कई मौकों पर, अजीत सिंह सरकारी संरचनाओं के साथ-साथ गठबंधनों में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक व्यक्ति रहे हैं।

वह 1989 में बागपत से लोकसभा के लिए चुने गए। वह दिसंबर 1989 से नवंबर 1990 तक वीपी सिंह के मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री थे। 1991 के चुनाव में उन्हें फिर से लोकसभा के लिए चुना गया। उन्होंने पी वी नरसिम्हा राव के मंत्रिमंडल में खाद्य मंत्री के रूप में कार्य किया। 

अजित सिंह को 1996 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में फिर से चुना गया लेकिन 1996 में पार्टी और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। फिर उन्होंने राष्ट्रीय लोक दल की स्थापना की और 1997 में चुनाव के बाद फिर से निर्वाचित हुए। वह 1998 का ​​चुनाव हार गए और 1999, 2004 और 2009 में फिर से चुने गए। 2001 से 2003 तक, वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कृषि मंत्री थे। 
2011 में उनकी पार्टी सत्तारूढ़ UPA में शामिल हुई और चौधरी साहब दिसंबर 2011 से मई 2014 तक नागरिक उड्डयन मंत्री रहे ।

उन्होंने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को बखूबी आगे बढ़ाया ,  वे एक बार राज्य सभा सांसद और सात बार लोक सभा सांसद रहे. हालांकि 2014 और 2019 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

अब यह शख्सियत हमारे बीच नहीं रही हम ईश्वर से कामना करते हैं की चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजीत सिंह की विरासत को जयंत चौधरी नई उचाइओ तक लेकर जायेंगे और जाट राजनीति को नेतृत्व प्रदान करेंगे।  

~सैयद रिजवान ज़ैदी 

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