जश्न के अरमान दिल में ही लिए विदा हुए त्रिवेन्द्र:अपनों के हमलों से हुए हलकान

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जश्न के अरमान दिल में ही लिए विदा हुए त्रिवेन्द्र:अपनों के हमलों से हुए हलकान

अद्भुत बहुमत के बावजूद स्थिर सरकार देने में फिर नाकाम रही बीजेपी

चेतन गुरुंग

देहरादून। मुख्यमंत्री के तौर पर त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने आज 9 दिन कम चार साल पूरे कर लिए थे। बीजेपी शासन में इतनी लंबी अवधि तक मुख्यमंत्री आज तक कोई नहीं रहा था। उन्होंने ये रेकॉर्ड बनाया। 18 मार्च को सरकार के चार साल पूरे होने पर हर विधानसभा में जश्न मनाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी। अचानक उनकी उस तकदीर को मानो ग्रहण लग गया, जो उनको कड़ी चुनौती में मुख्यमंत्री बना के मानी थी। आज जब राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को इस्तीफा सौंपने के बाद पत्रकारों से बात कर रहे थे तो अपनी पीड़ा दबा पाने में सफल नहीं हुए। इस्तीफा क्यों दिया गया ? ये पूछने पर त्रिवेन्द्र ने कहा, `इसका जवाब पाने के लिए आपको दिल्ली जाना होगा

जो लोग पाँच साल का कार्यकाल पूरा न कर पाने के लिए त्रिवेन्द्र को बदकिस्मत मान रहे, उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि कई किस्म के विवादों के बावजूद हाई कमान ने उनको इससे पहले पूरा संरक्षण दिया। संगठन के लोगों में उनकी कार्यशैली को ले के असंतोष था। फिर भी उनका बाल भी बांका नहीं कर पा रहे थे। 48 महीने राज करने की उपलब्धि बीजेपी राज में कोई मुख्यमंत्री नहीं पा सका था। सिर्फ काँग्रेस राज के दौरान एनडी तिवारी ही पाँच साल मुख्यमंत्री रह सके थे। उन्होंने उस मिथ को तोड़ने की कोशिश भी की, जिसके मुताबिक नए मुख्यमंत्री आवास पर रहना अपशकुन होता है। मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाते हैं।

वह उसी सीएम आवास में रहे। सब कुछ माफिक दिखाई देने के बावजूद उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी से रुखसत होना पड़ा तो ये बहस फिर सिर उठा सकती है कि नया आवास क्या वाकई मनहूस है? 70 में से 57 विधायक होने और आला कमान का आशीर्वाद के बावजूद भला कोई सीएम कैसे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकता है। इसको ऐसे भी देखा जा सकता है कि त्रिवेन्द्र वास्तव में बहुत भाग्यशाली-खुशकिस्मत थे जो मुख्यमंत्री बने। जब उन्होंने शपथ ली थी तब भगत सिंह कोश्यारी, प्रकाश पंत (अब मरहूम), अजय भट्ट, बिशन सिंह चुफाल, रमेश पोखरियाल निशंक सरीखे कद्दावर किस्म के नेता भी दावेदारों की पंक्ति में थे।

त्रिवेन्द्र को आला कमान का पग-पग पर साथ-संरक्षण मिलने के बावजूद हटना पड़ा तो इसकी कई वजह मानी जा रही है। इनमें संगठन को अहम फैसलों में शामिल न करना, खास लॉबी का लगातार उनकी मुखालफत करना, नौकरशाही में लॉबी विशेष और इने-गिने नामों पर ही निर्भर रहना, उत्तराखंड-दक्षिण भारतीय मूल के नौकरशाहों की उपेक्षा, डीएम-पुलिस कप्तानों की नियुक्तियों में पार्टी के नेताओं की राय का ख्याल न रखना, हाल ही में गैरसैण को नया और तीसरा मण्डल बनाना और मंत्रिपरिषद में खाली सीटों को चार साल होने को आने के बावजूद न भरा जाना शामिल है।

बद्री-केदार देवस्थानम बोर्ड के गठन का फैसला भी उनको भारी पड़ा। उनके पास कभी भी सलाहकारों और नौकरशाहों की सशक्त टीम नहीं रही। जो लोग उनकी टीम में थे, वे अपने काम-धंधों में ही व्यस्त रहे। सोशल मीडिया और मुख्य मीडिया में त्रिवेन्द्र पर जब भी तेज हमले हुए, उनके बचाव के लिए कभी भी उनके मीडिया सलाहकार-मीडिया कॉ-ओर्डिनेटर सामने नहीं आए। वे न तो पत्रकारों से संवाद रखते थे, न ही सीएम की छवि को चोटिल होने से बचाने की परवाह करते दिखे। पार्टी के भीतर उनकी विरोधी लॉबी ने ऐसा माहौल बना दिया था कि हाई कमान को भी शंका होने लगी कि त्रिवेन्द्र के रहते कहीं बीजेपी एक साल बाद होने वाला विधानसभा चुनाव न हार जाए।

इसी खौफ ने पार्टी आला कमान को मजबूर कर दिया कि कभी अपनी आँख के तारे रहे त्रिवेन्द्र को बदल दिया जाए। इसके साथ ही त्रिवेन्द्र अपने सरकार के चार कामयाब साल पूरे होने के अवसर पार व्यापक जश्न मनाने की हसरत दिल में ही रख के रह गए। पार्टी भी एक बार फिर अवाम को ये संदेश देने में असफल हो गई कि वह उत्तराखंड में स्थिर सरकार दे सकती है। ये तथ्य है कि बीजेपी राज में कभी भी एक सीएम नहीं रहे। हालांकि बदल के भी हर विधानसभा चुनाव में कमल मुरझाया ही है। कभी खिला नहीं। 

ये माना जा रहा है कि नए मुख्यमंत्री जो भी बने लेकिन उसके चयन में आला कमान त्रिवेन्द्र की इच्छा को भी सम्मान देगी। ऐसे में ये लग रहा है कि जिस लॉबी ने उनकी जड़ों को काटने में अहम भूमिका निभाई, उसके हिस्से सीएम की कुर्सी शायद ही आएगी। सूत्रों के अनुसार त्रिवेन्द्र ने हाई कमान को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर दो पसंदीदा नाम बता दिए हैं। कल सुबह 10 बजे विधायक दल की बैठक में साफ हो जाएगा कि उन दो में से के नाम को सीएम बनाया जा रहा या फिर कोई नया नाम होगा।

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