सादात ए बारहा का एक अज़ीम सिपहसालार : नवाब सैय्यद नुसरत यार खां

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हिन्दुस्तान की तारीख में एक से एक बहादुर योद्धा गुज़रे हैं इन्हीं में से एक नाम नवाब सैय्यद नुसरत यार खां “रुकनुद्दौला" का भी है ।आपका ताल्लुक जिला मुजफ्फरनगर में आबाद सादात ए बारहा  की छातरौडी शाख के गांव कैथोडा में आबाद महमूद खानी शाख से था।


नवाब नुसरत यार खां का सिलसिला ए नस्ब नवाब सैय्यद परवरिश अली खान सूबेदार बिहार व पटना बा अहद बादशाह जहांगीर, के छोटे भाई सैय्यद खान मंसबदार ए शाही  के सिलसिले से है ।आपके वालिद का नाम नवाब सैय्यद नज़र मुहम्मद रुकनुद्दौला था।


सैय्यद नुसरत यार खान का असली नाम सैय्यद हिदायतुल्लाह खान था मगर जंगे जाजूज़न में उनकी बहादुरी और जवांमर्दी को देखते हुए मुगल बादशाह बहादुर शाह अव्वल ने उनको नवाब नुसरत यार खां के खिताब से नवाजा और धीरे-धीरे इसी नाम से मशहूर हुए।


अपने जंगी सलाहियत और सूझबूझ  के चलते  नुसरत यार खां को जहां शाही मनसबो  पर उरुज मिलता रहा वहीं दरबारी सियासत के चलते लोग उनसे हसद भी रखने लगे ।
शाही मुलाजिमत के दौरान सूबा रणथंभौर के डिप्टी फौजदार रहते हुए इनकी काबिलियत के चलते  15 मार्च 1719 को सूबा अजमेर और मेवात का फौजदार बनाया गया।इसके बाद इनको सूबेदार अजमेर मुकर्रर किया गया।बादशाह मोहम्मद शाह के दौर में इनको सूबेदार आगरा भी बनाया गया ।

 

बादशाह मुहम्मद शाह के दौर में 9 अक्तूबर सन् 1720 ई0 में सैय्यद  हुसैन अली खां की मौत हुई  व  इसी साल 15-16 नवम्बर  1720 हसन अली से पलवल के करीब हसनपुर की जंग हुई।इसमें जहां वालिये रामपुर अली मोहम्मद खां, ऐतमातुद्दौला मौहम्मद अमीन खान,आसफजाह मीर कमरुद्दीन खां, मुर्शीद कुली खां सूबेदार बंगाल , सादत खां बुरहानुल मुल्क के साथ साथ  सेथल के नवाब सैय्यद साबिर अली तातारी उर्फ सैय्यद फैजुल्ला सानी और नवाब महमूद पुर वगैरह लोग  शामिल थे।

 

 

वहीं बादशाह मुहम्मद शाह ने नुसरत यार खां को अपनी तरफ से जंग लगने की दावत दी ।इस जंग में नुसरत यार खां के शामिल होने की एक वजह यह भी थी कि दरबार ए शाही कि जिसमें सैय्यद भाईयों का बोलबाला था शाही फरमान की बिना पर नुसरत यार खां के ओहदे और जागीर को ज़ब्त कर लिया गया था जिसके चलते नुसरत यार खां वतन लौट आए थे। बादशाह के इस इसरार पर नुसरत यार खां इस जंग शामिल हुए । लेकिन बादे जंग वजीरुल मुल्क मुहम्मद अमीन खान जो सैय्यद भाईयों का बदतरीन दुश्मन था जो इनको पूरी तरह से बर्बाद कर देना चाहता था उसके सामने नुसरत यार खां खड़े हो गए और इन्होंने शहंशाह से आम माफीनामे हासिल करके इन्हें मुकम्मल तबाही से बचाया।

 


अपने अहदे सूबेदारी में इन्होने अजमेर व अतराफ में काफी तामीरात  करवाईं । इनमें से एक काम सैय्यद अब्दुल्ला खां के मक़बरे की तामीर भी था।एक बार जयपुर के राजा सवाई जय सिंह से दिल्ली हुकूमत के मुआमलात खराब हो गये और जंग की नौबत आ गई ।इस पर बादशाह ने नवाब नुसरत यार खां को उनको मय उनकी फौज और तोपखाने के मामलात को हल  करने का हुक्म दिया । लेकिन नुसरत यार खां की सूझबूझ ने हालात को बगैर किसी जंग के बेहतर बना लिया ।

 

नवाब नुसरत यार खां का इन्तेकाल 1723 ई0 में पटना में हुआ था वहीं कुछ तारीखी हवालो  के अनुसार इनका इन्तेकाल सूबा अहमदाबाद के जिला सूरत की  तहसील पराचौली जो इनकी 24 गांवों की जागीर थी वहीं हुआ और वही इनका मदफन है।


 हवाला किताबियातबहादुर शाह नामा, असनाद उस सनादीद,तज़किरा तुस सलातीन , रोजनामचा मौहम्मद ज़फ़र

 ( तारीखी हवाले)

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