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लोकसभा चुनाव में कम मत प्रतिशत और चुनावी जुमले

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, और पार्टी व केंद्र सरकार का नेतृत्व उनके हाथों में होने को भाजपा ने अपना एक प्रमुख चुनावी हथियार बनाया है।

जावेद अनवर

लेखक मनोविज्ञान के विश्लेषक है

आम चुनाव के दूसरे चरण में शुक्रवार को 13 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की 88 सीटों के लिए मतदान हुआ। इन सीटों पर मतदान का तुलनात्मक आकलन दिखाता है कि पूर्व और पूर्वोत्तर (असम, मणिपुर, त्रिपुरा, और पश्चिम बंगाल) में ज्यादा वोट पड़े (70 फीसदी से ज्यादा) और बिहार व उत्तर प्रदेश में पुराने ढर्रे के मुताबिक कम वोट पड़े (60 फीसदी से कम)। केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में भी मतदान में कमी देखी गयी, मगर कारणों के गहन विश्लेषण के लिए विस्तृत पोस्ट-पोल (मतदान-बाद) सर्वेक्षणों का इंतजार करना चाहिए। वर्ष 2019 की तुलना में, पहले चरण के चुनाव में भी मतदान में गिरावट आयी है। इसने भारत निर्वाचन आयोग को इस बात पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्या कई राज्यों में लू की स्थिति इसके लिए जिम्मेदार है। यह एक पहलू हो सकता है, लेकिन इस धारणा को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि इस बार मतदाता अपनी पसंद को लेकर 2019 के चुनाव जितना प्रेरित नहीं लग रहे हैं। सन् 2019 में भाजपा का स्पष्ट बहुमत और अपना उच्चतम मत प्रतिशत (वोट शेयर) हासिल करना भारी मतदान से जुड़ा हुआ था। इस तथ्य के मद्देनजर इस बार का कम मतदान उसके लिए चिंताजनक लक्षण हो सकता है। हालांकि, पारंपरिक रूप से, भाजपा के भारत की दलीय प्रणाली का केंद्रबिंदु बनने से पहले के चुनावों में, उच्च मतदान आम तौर पर सत्ता-विरोधी लहर का संदेश देता रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, और पार्टी व केंद्र सरकार का नेतृत्व उनके हाथों में होने को भाजपा ने अपना एक प्रमुख चुनावी हथियार बनाया है। उन्होंने भोंडी सांप्रदायिक बयानबाजी और कांग्रेस पार्टी के घोषणापत्र की आलोचना का सहारा लिया है।

यह एक दोहरी चाल की ओर इशारा करता है। हिंदुत्ववादी एजेंडे में यकीन रखने वाले पार्टी के उत्साही समर्थक आधार की भावनाओं में उबाल लाना और मतदान में इन तबकों की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश करना। और, सामाजिक न्याय के एजेंडे (हालांकि यह जाति जनगणना द्वारा संभव बनाये गये स्वीकृति के विचार पर टिका है) और विस्तारित लोक-कल्याण (नव-कीन्सवादी नीतियों के जरिए) की कांग्रेस की सुचिंतित चुनावी-धुरी को बदनाम करना। हिंदी हृदयस्थली में कांग्रेस ने अपना जनाधार उन पार्टियों के हाथों खो दिया जिन्होंने 1990 के दशक से मझोली व निचली जातियों पर आधारित गोलबंदी की ‘मंडल’ राजनीति का समर्थन किया।

तब भाजपा ने ओबीसी के उन तबकों की गोलबंदी कर इन पार्टियों को शिकस्त दी जो मंडलवादी पार्टियों में चुनिंदा मझोली जातियों के प्रभुत्व के चलते छूटा हुआ महसूस कर रहे थे। इसके अलावा, उसने हिंदुत्व का इस्तेमाल करके एक ठोस जनाधार बनाया। अब कांग्रेस उन मंडलवादी पार्टियों के साथ गठबंधन करके अपना पुनरुद्धार करना चाह रही है जो खुद भी एक नये पुनरुत्थान की तलाश में हैं।

इसने भाजपा और मोदी को सबसे पुरानी पार्टी के घोषणापत्र को, खासकर लोक-कल्याण पर उसके जोर को, बदनाम करने पर मजबूर किया है। इसके लिए जानी-पहचानी सांप्रदायिक लफ्फाजी का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह देखना बाकी है कि क्या मतदाता इस बयानबाजी से भावनात्मक रूप से प्रभावित होंगे या बेहतर नौकरियों और रोजी-रोटी की अपनी उम्मीदों से इसका तार्किक मिलान करके देखेंगे। अगले चरणों की ओर बढ़ रहे चुनाव की दिशा इसी से तय होगी।

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