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कभी शीशगढ़ कस्बे से दिखती थी दिल्ली

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शेर शाह सूरी ने कस्बे में बनवाया था करीब चार सौ फीट ऊंचा गरगज


बरेली,शाह टाइम्स (मो इरफान)। बरेली का इतिहास बड़ा समृद्ध है। महाभारत काल में यदि यह पांचाल नगरी के रूप में विख्यात थी, तो ब्रिटिश शासन रोहिला नबावों की वीरता से गर्वित रही धरती, इतिहासकार बताते हैं कि मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर पर आफत आई तो उन्होंने यहां के खान बहादुर खान से मदद का आग्रह किया।

पुराने जमाने की कई स्मृतियों की गवाह है यह धरती इसी परीप्रेक्ष में शेर शाह सूरी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता। शेर शाह सूरी के नाम पर ही शीशगढ़ कस्बा बसा है। शेर शाह सूरी ने शीशगढ़ कस्बे में करीब चार सौ फीट ऊंचा गरगज बनवाया था। जिसपर चढ़कर लोग दिल्ली तक का नजारा करते थे, लेकिन पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के चलते प्राचीन गरगज का अस्तित्व ही मिट गया।


पुरातत्व विभाग एवं वक्फ बोर्ड की उदासीनता के चलते शीशगढ़ का मुगल कालीन गरगज धीरे-धीरे खुर्द बुर्द करके गिरा दिया गया, और इसकी बेशकीमती जमीन पर अवैध कब्जे करके बड़ी-बड़ी इमारतें बनकर खड़ी हो गईं। जिस जगह पर गरगज बनाया गया था, उस जगह को गढ़ी कहते हैं। गरगज की ऊंचाई इतनी अधिक थी कि गरगज के गिरने से उसके मलबे से पूरा एरिया करीब एक एकड़ सबसे ऊंचा हो गया।


बताते हैं कि करीब साढ़े चार सौ साल पूर्व मुगल शासक शेर शाह सूरी ने शीशगढ़ में एक विशाल गरगज बनवाया था, जिसकी ऊंचाई करीब चार सौ फीट थी। इस गरगज पर चढ़ने के लिए एक सीढ़ी भी बनाई गई थी, जिसपर चढ़कर मुगल शासक शेर शाह सूरी की सेना दिल्ली, लखनऊ तक की गतिविधियों पर नजर रखती थी, तथा सेना की गतिविधियों का संचालन भी यहीं से होता था। शेर शाह सूरी के बाद ब्रिटिश सेना भी इसी विशाल गरगज पर चढ़कर अपनी गतिविधियों का संचालन करती थी।

शेर शाह सूरी के ज़माने में बसा था शीशगढ़

इतिहासकार बताते हैं कि शेर शाह सूरी के जमाने में ही शीशगढ़ बसा था, पहले इसका नाम शाहगढ़ फिर सिसौलीगढ़ रखा गया, बाद में इसका नाम संशोधित करके शीशगढ़ कर दिया गया।
यदि मुगल कालीन प्राचीन गरगज की देख रेख ठीक तरह से की जाती तो शायद आज गरगज का अस्तित्व नहीं मिटता। इस लापरवाही में पुरातत्व विभाग भी जिम्मेदार है, जो अपनी धरोहर की सही तरीके से देख भाल नहीं कर सके, और एक पहचान ही खत्म हो गई।

मिट्टी कंकरीली ईंटों से बनाया गया था गरगज

गरगज को बड़ी ही तकनीकी के साथ बनाया गया था। इसमें कंकरीली ईंट व मिट्टी, चूने के का मिक्सर अच्छी तरह से इस्तेमाल किया गया था, जो बेहद मजबूत था। इसके अंदर बनी सीढ़ी से होकर गरगज के ऊपरी हिस्से तक पहुंचते थे। गरगज कितना मजबूत था और कितनी कारीगरी के साथ बनाया गया था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चार सौ साल तक गरगज मजबूती के दाम पर खड़ा रहा, लेकिन उचित रख रखाव न होने के कारण धीरे-धीरे गरगज का अस्तित्व ही मिट गया। वेश कीमती रिहाइश जमीन पर अवैध कब्जे करने के उद्देश्य से ग्रामीणों ने भी गरगज का बुजूद मिटाने में अपना योगदान दिया, जो बड़ा निंदनीय भी है।

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